Thursday, September 29, 2016

संस्कृति-प्रेमी राजनेता अशोक गहलोत ???

शनिवार, एक अक्टूबर को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर में होंगे। अवसर है कवि-गीतकार हरीश भादानी के पांच खण्डों में प्रकाशित रचना समग्र के लोकार्पण का। 2 अक्टूबर, 2009 को जब भादानी का निधन हुआ उस दिन भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर में ही थे, उन्हें जब मालूम हुआ तो वे संवेदना प्रकट करने भादानी के आवास पर पहुंचे।
अशोक गहलोत उन गिने-चुने राजनेताओं में माने जाते हैं जिन्हें यह समझ है कि पत्रकारिता और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों की समाज को कितनी जरूरत है। उनमें भी कौन कितनी पात्रता रखता है, इसका भान भी गहलोत को भली-भांति है। इसकी पुष्टि वे अपनी उबड़-खाबड़ राजनीतिकचर्या से पलट जब-तब करते हैं।
लेकिन क्या एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन और शासकवर्ग की ओर से इतना भर पर्याप्त होता है, नहीं होता। ऐसी समझ भारत के राजनेताओं में से जिनमें सर्वाधिक देखी गई, वह देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। उन्होंने अपने शासन में शिक्षा, साहित्य, संगीत, कला और अन्य सांस्कृतिक क्षेत्रों से संबंधित संस्थानों, विश्वविद्यालयों और अकादमियों की स्थापना का महती काम किया। इतना ही नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों में अपने दृढ़ विश्वास के चलते उन्होंने सभी संस्थानों का स्वरूप ऐसा बनाया कि किसी भी ऐसी इकाई में शासन का हस्तक्षेप न हो। वे अपनी पूरी स्वायत्तता से काम कर सकें और निश्चित अवधि में होने वाले नियन्ताओं को बदलने में किसी भी तरह के बाहरी दबाव को न झेलना पड़े।
यह सब इसलिए लिखा जा रहा है कि अशोक गहलोत इन मामलों में अपने अधिकांश समकक्षों से बेहतर तो हैं लेकिन दो बार सूबे के मुखिया रहने के बावजूद ऐसा कुछ भी करने का समय वे नहीं निकाल पाए कि राजस्थान की अकादमियां, सांस्कृतिक संस्थान और विश्वविद्यालय पूर्ण स्वायत्तता से काम कर पायें। ऐसी व्यवस्था न कर पाने का कोई बहाना इसलिए नहीं हो सकता कि आपकी मंशा यदि होती तो ऐसा करने की गुंजाइश निकाली जा सकती थी। गहलोत के पहले कार्यकाल की शुरुआत में राजस्थान की अकादमियों के ढांचे को लेकर एक आलेख सूबे के एक बड़े अखबार के लिए नन्दकिशोर आचार्य ने लिखा था। आचार्य ने राजस्थान की अकादमियों में राजनैतिक और ब्यूरोक्रेटिक हस्तक्षेप और उनकी दुर्दशा पर चिन्ता प्रकट करते हुए सुझाव दिया था कि इनके गठन का स्वरूप नेहरू द्वारा स्थापित साहित्य अकादमी, दिल्ली जैसा कर दिया जाना चाहिए। पता नहीं उस आलेख का फीडबैक तब गहलोत तक पहुंचा या नहीं, नहीं भी पहुंचा है तो उनके 'पीआर' की ही कमी थी। लेकिन यह सब करना तो दूर, उनके दोनों कार्यकाल में संस्कृति और अकादमियों से संबंधित काम अंतिम प्राथमिकता में रहे। इस तरह की सजगता न हो तो काबिल संस्कृतिकर्मियों के प्रति उनकी यदाकदा की सदाशयता के मात्र प्रदर्शन को चतुराई से ज्यादा नहीं माना जायेगा।
बीकानेर के संदर्भ से ही बात करें तो यहां के रवीन्द्र रंगमंच का निर्माण पिछले चौबीस वर्षों से चल रहा है। यानी जो काम दो-ढाई वर्ष में निबट जाना था उसे इस स्थिति में पहुंचा देने को क्या कहेंगे। इन चौबीस वर्षों में दस वर्ष गहलोत के नेतृत्व की सरकारें रहींअपने मुख्यमंत्रित्व काल में गहलोत कई दफे बीकानेर आए। हर बार नहीं तो कई बार इस रंगमंच निर्माण की दुर्दशा के बारे में उन्हें जानकारी दी गई। पर नहीं लगता उन्होंने कभी शहर की इस सांस्कृतिक जरूरत को गंभीरता से लिया हो। अलावा इसके राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति की एक अकादमी बीकानेर में ही है, भवन के अलावा उस अकादमी का कोई अस्तित्व बचा भी है क्या। एक-एक करके इस अकादमी के लगभग सभी कार्मिक सेवानिवृत्त हो लिए। कई तो गहलोत के कार्यकाल में ही सेवानिवृत्त हुए। क्या कभी जरूरत समझी गई कि यह अकादमी सुचारु रूप से काम करे। कमोबेश ऐसी दुर्दशा को प्राप्त होने को प्रदेश की दूसरी अकादमियां भी हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में कुछ बेहतर कर गुजरने के अवसर कभी-कभार ही हासिल होते हैं। उम्मीद करते हैं कि गहलोत जैसे संवेदनशील राजनेता को वैसा अवसर फिर मिले। लेकिन इस उम्मीद की उम्मीदें भी कई हैं। वे उम्मीदें इसलिए भी हैं कि प्रदेश में गहलोत अकेले ऐसे राजनेता हैं जो किसी भी गांव, तहसील, जिले में चले जाएं आज भी ऐसे सैकड़ों लोग मिल जाएंगे जो उचककर अशोक गहलोत को अपना चेहरा दिखाना चाहते हों। ऐसे में क्या यह उम्मीद करें कि उन्हें सूबे की मुखियाई फिर मिले तो वे अपने को सही मायने में संस्कृतिप्रेमी राजनेता साबित कर पाएंगे। क्योंकि ऊपर दिए गए सभी उलाहनों के बावजूद ऐसी उम्मीदों की गुंजाइश प्रदेश के किसी राजनेता में है तो फिलहाल अशोक गहलोत में ही नजर आती है।

29 सितंबर, 2016

Thursday, September 22, 2016

युद्धों ने कभी समाधान नहीं दिए

इस वर्ष अब तक सात और इससे पहले के पिछले पन्द्रह वर्षों में पाकिस्तानी सीमा से 19 आतंकी हमले हुए हैं। जम्मू-कश्मीर के उड़ी में रविवार तड़के हुए हमले की खबर के साथ दैनिक भास्कर द्वारा इस तरह के पिछले सोलह हमलों की पड़ताल भी छापी गई। यह पड़ताल वैसे तो यह समझने के लिए पर्याप्त है कि अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश का शासन हड़पने के लिए छप्पन इंची सीने के दावे पर जनता को किस तरह बरगलाया था। इस बात का आज अवसर नहीं है लेकिन फेसबुक-ट्यूटर और एनडीटीवी को छोड़ कर अधिकांश न्यूज चैनलों पर उड़ी की आतंकी घटना के बाद जिस तरह उग्रता देखने को मिल रही है उससे लगता है कि ना केवल ऐसे मुखर लोगों की बल्कि मीडिया जैसे लोकतंत्र के चौथे पाए की समझ ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर कितनी खतरनाक है। इनमें से अधिकांश ये बिना समझे कि युद्ध ने कभी भी समाधान नहीं दिएपाकिस्तान पर युद्ध थोपने पर उतारू हैं।
इस तरह की बात करने से पहले पाकिस्तान की अन्दरूनी असलियत और अपनी ताकत, दोनों को आंकना जरूरी है। 'विनायक' ने ऐसी घटनाओं पर हर बार संयम से उन परिस्थितियों को समझने-समझाने की कोशिश की जिनके चलते इस तरह की घटनाओं पर खुद पाकिस्तान की चुनी हुई सरकारों का ही बस नहीं है। उन्हें फिर से यहां लिखने की बजाय पूर्व में लिखे पाकिस्तान से संबंधित सम्पादकीयों को साझा करना ही उचित होगा। 5 अगस्त 2013 की रात ऐसा ही आतंकी हमला हुआ था। तब 7 अगस्त 2013 को 'विनायक' में लिखा सम्पादकीय हो सकता है हमें ऐसी घटनाओं पर कुछ सकारात्मक ढंग से विचारने को विवश करे इनके अंश :
जम्मू और कश्मीर में भारत-पाकिस्तान नियन्त्रण रेखा पर सोम और मंगल के बीच की रात पाकिस्तान की ओर से कुछ हमलावरों ने पांच भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी। यह बर्बर कृत्य निन्दनीय है और संसद से लेकर टीवी-अखबारों से होती हुई शहर के पाटों तक इस पर चिन्ता और इसकी निन्दा हो रही है। देखा-सुना गया है कि इस तरह की घटनाओं के बाद निन्दा करते हुए सामान्य आदमी तो गुस्से में अविवेकी भाषा बोलने और उपाय बताने लगता है लेकिन जिन लोगों के पास देश की जिम्मेदारी के महती पद हैं या जिन्होंने हजारों, लाखों वोट लेकर नुमाइंदगी का हक हासिल कर रखा है, वे भी अविवेकी प्रतिक्रियाएं देने लगे तो चिन्ता की बात है। चाहे वह चीनी घुसपैठ के समय की हो या पाक जेल में सरबजीत की हत्या या सीमा पर आए दिन होने वाली जघन्य घटनाएं, पिछले एक अर्से से देखा गया है कि ऐसे समय पर हमारे राजनेता इस तरह से बयान देने और कोसने लगते हैं कि क्यों ना जस का तस या बढ़ चढ़ कर करारा जवाब दे दिया जाय। यहां तक कि अपनी पारी के समय सरकार की बड़ी जिम्मेदारियां निभा चुके बड़े नेता भी भूल जाते हैं कि उनके सरकार में रहते क्या वही कुछ करते जो इस सरकार से चाहा जा रहा है या हमेशा ही कोरी उत्तेजना पैदा कर राजनीतिक लाभ लेने की ही फिराक में रहते हैं।
भारत-चीन सीमा विवाद को छोड़ देते हैं, विनायक इस पर पहले लिख चुका है। भारत-पाकिस्तान का मामला ना केवल संवेदनशील है बल्कि पाक की अन्दरूनी स्थिति को देखते हुए यह लाइलाज भी है, कहने को तो जवाबदेही वहां की निर्वाचित सरकार की बनती है लेकिन जैसी वहां की परिस्थितियां हैं, असलियत में अधिकृत-अनधिकृत तौर वहां इतने स्वघोषित जवाबदेह समूह सक्रिय हैं कि लगभग अराजकता की स्थिति है। सबसे प्रभावी तो वहां की सेना है जिस पर निर्वाचित सरकारों का वास्तविक नियन्त्रण कभी रहा ही नहीं। ऐसी सी स्थिति में वहां की खुफियां एजेन्सी आइएसआई (इंटर-सर्विस इंटेलीजेंस) है। इसके बाद पाकिस्तान में ऐसे कई आतंकवादी और ताकतवर उग्र समूह सक्रिय हैं जिनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबाव में वहां के शासक हमेशा रहते हैं।
अब आप किसी ऐसे पड़ोसी की कल्पना कीजिये जिस घर परिवार में कमोबेश ऐसे ही लोग हों तो शाश्वत शान्ति से आप भी रह सकते हैं क्या? आप खुद दबंग हों तो भी शत-प्रतिशत संतोष के साथ तब भी नहीं। इस तरह की स्थितियों से निबटने के लिए स्वयं की सावचेती और जरूरत पडऩे पर आंख दिखाने और डांटने-डपटने के अलावा कोई क्या कर सकता है। ऐसे ही पड़ोस की भूमिका में पाकिस्तान है, उसके पास ठीक-ठाक सैन्य ताकत है, चाहे वह किसी तरह बनाई हो। सरकार वहां चुनी हुई रही हो या सैन्य, वह कभी भी पूरे विवेक से निर्णय करने की स्थिति में नहीं रही। अलगाववादियों के बरगलाए आतंकवादी समूह कभी सीमा पर बदमजगी करते हैं तो कभी-कभार धाए-धापे और तनाव में वहां के सैनिक भी कुछ गलत हरकत कर बैठते हैं, कभी कोई सैनिक अफसर भी अपनी सनक तुष्ट करने को इस तरह की वारदातों को अंजाम दिलवा देते हैं।
हमारी सेना के सन्दर्भ से भी इस तरह की हरकतों के समाचार गाहे-बगाहे सुनते-पढ़ते हैं जिसमें सैनिक खुद को गोली मार लेता है या कोई अपने कई सहयोगियों को ढेर कर देता है, सीमा या पड़ोसी देश के सैनिकों के साथ भी वह कभी कुछ करता है तो वह खबर हमारे यहां नहीं आती, आती भी है तो रंग बदलकर। ऐसे ही मनुष्य पाकिस्तान में हैं, वहां की परिस्थितियां ऐसी हैं कि वहां के लोग तनाव में ज्यादा रहते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं की संख्या उधर से ज्यादा है। हम पड़ौसी हैं तो सबसे ज्यादा प्रभावित हमें ही होना है। ना हम वहां की स्थितियों को सुधारने की अवस्था में है और ना ही उसे नेस्तानाबूद करने की हैसियत में। ऐसी घटनाओं के उपाय और उपचार कूटनीतिक ही होते हैं, जिनमें वहां के शासकों को कड़ा विरोध जताने या कभी-कभार सेना द्वारा तत्क्षण करारा जवाब देना शामिल हो सकते हैं और होता ही है। अगर ऐसा नहीं होता है तो होना चाहिए, सभी सरकारें करती भी रहीं हैं, फिर वह चाहे राजग की सरकार के समय करगिल की घुसपैठ हो या संसद पर हमला या फिर संप्रग सरकार के समय की 26-11 की मुम्बई की घटना हो या सीमा पर हुई जघन्य वारदातें।
राजनीतिक हितों को साधने के लिए बिना सोचे-समझे आमजन में अतिरिक्त उत्तेजना पैदा करना, ना देश के हित में है और ना ही मानवीयता के।
अब दिनांक 24 अगस्त, 2015 को लिखे संपादकीय को पुन: इस समस्या के बातचीतीय समाधान के तौर पर भी समझने की कोशिश कर सकते हैं :-
घर के कुमाणस पड़ोसी से छुटकारे का उपाय है, बात गले तक आने पर अनुकूलता बनते ही आप घर बदल सकते हैं। पड़ोसी देश यदि ऐसा हो, उससे छुटकारे का कोई विकल्प नहीं है। भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर अपनी यह बात 'विनायक' ने एकाधिक बार दोहराई है। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी राजग सरकार से मतदाताओं ने जो उम्मीदें बांध बहुमत दिया उनमें एक बड़ी उम्मीद पाकिस्तान के साथ रोज-रोज की इन परेशानियों से छुटकारे की भी थी जिनके चलते सीमाओं पर रोज की गोलाबारी की नौबत है और सीमा पार से आए आतंकियों की हिंसा का शिकार भी जब तब होना पड़ता है।
नरेन्द्र मोदी अपने चुनाव अभियान के दौरान अपनी पीठ खुद इसलिए थपथपाते रहे कि पड़ोसी देश की बेजा हरकतों को डपटने के लिए छप्पन इंच के सीने की जरूरत होती है और साथ ही यह अपरोक्ष  भरोसा भी वह देते रहे कि ऐसा छप्पन इंचीय सीना उनके पास है। जनता ने मोदी के कहे पर भरोसा भी किया और ऐसे पूर्ण बहुमत की सरकार बनवा दी जिसकी उम्मीद खुद उनको भी नहीं थी।
अन्तरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति की समझ के लिए सीने की क्या भूमिकाएं होती है, पता नहीं लेकिन चुनाव अभियान के दौरान मोदी के दिए अन्य सभी भरोसों, वादों और जुमलों की तरह ही यह छप्पन इंचीय भरोसा धराशायी होता दीख रहा है। केन्द्र में इस नई सरकार के बाद भारत-पाक सीमा पर न केवल घुसपैठ बढ़ी है, बल्कि पिछले वर्षों की तुलना में गोलाबारी की अधिकता से चिन्ता में भी बढ़ोतरी हुई है।
पाकिस्तान में कभी लोकतांत्रिक शासन होता भी है तो उसके हाथ पूरी तरह खुले नहीं होते। कई कारणों के चलते सेना का पूरा हस्तक्षेप रहता है जिनमें आंतरिक उग्रवादी गतिविधियां और सहोदर पड़ोसी भारत का भय मुख्य है। ऐसे में लोकतान्त्रिक तौर पर चुने शासक भी कुछ खास करने की स्थिति में नहीं होते। अपनी पिछली मुलाकात में भारत-पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ने तय किया था आपसी समस्याओं पर बातचीत फिर शुरू हो। इसी के अनुसरण में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत रद्द हो गई। भारत का मानना है कि यह बातचीत केवल आतंकवाद पर होनी थी, कश्मीर इसके ऐजेन्डे में ही नहीं था। जबकि पाकिस्तान यह मानता रहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच मुख्य समस्या ही कश्मीर है। अपनी इस बात को पुख्तगी देने के लिए पाकिस्तान की कोशिश रहती है कि वह भारत के साथ हर बातचीत के दौरान उन कश्मीरी अलगाववादियों से मिले जिनका झुकाव पाकिस्तान की तरफ है। उधर भारत-पाक संबंधों के जानकारों का मानना है कि पाक सेना कभी चाहती ही नहीं है कि भारत-पाकिस्तान मित्र भाव से रहें। यदि ऐसा होता है तो उनकी हड़पी ताकत कम हो जाएगी। पाक सेना ने बड़ी चतुराई से देश में उग्रवादी गुटों को हर अनुकूलता देकर अपनी ताकत बढ़ाने की जरूरत बनाए रखी है।
बात अब अपने देश भारत की कर लेते हैं। पूरी तरह बदल चुके अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य के चलते और पाकिस्तान के भी परमाणु ताकत बनने के बाद करगिल जैसे सीमित युद्ध भले लड़े जाएं, व्यापक सीमाई थल, वायु और जलीय युद्ध भयावह हो सकते हैं। हो सकता है भारत की नई सरकार ऐसे युद्धों को समाधानों के रूप में देखती हो क्योंकि वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल ऐसी धैर्यहीन मंशा यह कहते हुए जता चुके हैं कि परमाणु युद्ध भी हुआ तो भारत नाम-निशान जितना ही सही फिर भी बच जायेगा, पाकिस्तान कितना बचेगा वह देखे। उम्मीद करते हैं कि ऐसी मंशा वाले सलाहकारों के चलते इस क्षेत्र को कभी विध्वंसनशील स्थितियों से न गुजरना पड़े।
मानवीय समस्या का समाधान बातचीत से हो उसे जारी रखने से परहेज उचित नहीं है। रही कश्मीर की बात तो भारत-पाकिस्तान के बीच मुख्य समस्या ही कश्मीर है। कश्मीर यदि भारत का है तो यह क्यों भूल जाते हैं कि उसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से में है। जैसा एक फेसबुक मित्र आशुतोष कुमार ने कहा कि कश्मीर पर बात नहीं करोगे तो इसका सन्देश कहीं यही तो नहीं दिया जा रहा कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत ने अन्तिम रूप से पाकिस्तान का हुआ मान लिया। पूरा कश्मीर भारत का है तो उसके पाक अधिकृत हिस्से को क्या बिना कश्मीर पर बात के हासिल कर सकते हैं।
भारत की इस सरकार को पहले तो यह मान लेना होगा कि कश्मीर की स्थिति देश की उन दूसरी रियासतों की समस्याओं की तरह की नहीं है जिनका विलय आजादी बाद भारत में हुआ था। इसे नजरअन्दाज करना समस्या के शान्तिपूर्ण हल की ओर बढऩा नहीं है। रही बात पाक द्वारा की जाने वाली आए दिन की कुचरनी की तो पाकिस्तान भी यह मानता है कि पूर्वी पाकिस्तान में अलगाववादियों को भारत ने हवा देकर बांग्लादेश बनवाया था। इस घाव को पाकिस्तान के 'राष्ट्रवादीÓ सूखने नहीं देते। पाकिस्तान का यह भी आरोप है कि पाकिस्तान के जिन इलाकों में अलगाववादी सक्रिय हैं उनको भारत शह और साधन दोनों देता है। ऐसे में रास्ता यही है पाकिस्तान के तमाम बहानों के बावजूद भारत को बातचीत का माहौल बनाए रखना चाहिए। युद्ध हल नहीं है।
इतिहास गवाह है कि युद्ध ने कोई समाधान नहीं दिए हैं। छप्पन इंच का सीना जनता को बरगलाने हेतु चुनावी जुमले के तौर पर ही ठीक है, जिस किसी का होता भी है तो उनमें से अधिकांश को मोटापे के चलते अस्वस्थ ही माना जाता है। पाकिस्तान जिन स्थितियों से गुजर रहा है ऐसे में कैसी भी परिस्थिति में खोने को उसके पास कुछ नहीं है। भारत को बहुत कुछ खोना पड़ सकता है।

22 सितंबर 2016

Wednesday, September 14, 2016

ये जनप्रतिनिधि कुछ करेंगे भी या ढोंग ही करते रहेंगे

बीकानेर के सांसद हों या विधायक, इनके बारे में यह कहें कि ये काम कम और ढोंग ज्यादा करते हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिले के कुल सात में से चार विधायक उस भारतीय जनता पार्टी से हैं जिसकी ना केवल सूबे में सरकार है बल्कि केन्द्र में भी पूर्ण बहुमत के साथ इन्हीं की पार्टी की सरकार काबिज है। ऊपर से क्षेत्रीय सांसद भी भाजपा के ही हैं। सांसद अर्जुनराम मेघवाल अब तो भारी भरकम मंत्रालय के साथ केन्द्र में मंत्री भी हो लिए हैं। सूबे में भाजपा की सरकार बने तीन वर्ष हो रहे हैं तो केन्द्र में ढाई साल से ज्यादा। बावजूद इसके क्षेत्र को हासिल के नाम पर ठनठन गोपाल। वसुंधरा राजे सूबे की मुख्यमंत्री जब से बनी हैं तब से ही अधिकांशत: कोपभवन में अपना समय पूरा कर रही हैं। कारण, केन्द्र में अपनी पार्टी की सरकार के होते हुए भी रुतबा वह नहीं जो पिछली बार था। प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष, दोनों से ही पटरी नहीं बैठ रही, खमियाजा सूबे की जनता को भुगतना पड़ रहा है। व्यक्तिगत बातचीत में विधायक यह कहने में भी संकोच नहीं करते कि मैडम पार्टी विधायकों से तो दूर की बात अपने मंत्रियों को भी समय नहीं देंती।
फिर भी कहा जाता है कि बीकानेर से एक विधायक सिद्धिकुमारी का मुख्यमंत्री से पारिवारिक सा नाता है। लेकिन खुद सिद्धिकुमारी अपने क्षेत्र की जनता के वोट को अपने हक से ज्यादा नहीं समझती। लगभग आठ वर्ष से विधायक हैं, तीन वर्ष से पार्टी की सरकार है लेकिन क्षेत्र के लिए कोई उल्लेखनीय काम वह गिनवा नहीं सकतीं। बाज दफे तो वे यहां रहती ही नहीं हैं। रहती भी हैं तो उनसे मिलना संभव नहीं। वे खुद चाहें तो उन्हीं से मिलती हैं जिनसे मिलना होता है। बावजूद इसके कभी-कभार के यहां के प्रवास में मीडिया उन्हें सुर्खियां देने से नहीं चूकता। इस बाजारू युग में मीडिया के सरोकार बदल गये हैं। मीडिया जनता की आवाज बनने की बजाय नेताओं और विज्ञापनदाताओं का भोंपू होता जा रहा है।
ऐसी सी स्थिति सांसद और केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री अर्जुनराम मेघवाल की है। वह अभी यह ही तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें क्षेत्र की आम जनता के लिए क्या काम करने हैं। जबकि वे उस हैसियत को हासिल कर चुके हैं जिसमें क्षेत्र के लिए वे कुछ उल्लेखनीय कार्य कर सकें। गिनाने को वे कहेंगे कि हमने एक सवारी गाड़ी का नाम बदलवा दिया, लेकिन पूछें कि इससे क्षेत्र की जनता को क्या लाभ हुआ तो शायद बगलें झांकने लगेंगे।
इस सप्ताह मंत्री महोदय अपने क्षेत्र में ही थे। पत्रकारों के हवाई सेवा संबंधी सबसे आसान सवाल पर इस बार फिर उन्होंने नई तारीख दे दी है। मीडिया में हवाई सेवा की बात इस तरह होती है जैसे इस शहर के अधिकांश बाशिन्दे इस सेवा से कृतार्थ होने वाले हैं। कोई सुविधा शुरू हो इससे 'विनायक' को कतई एतराज नहीं है लेकिन जनप्रतिनिधियों और मीडिया वालों को उन सुविधाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जो व्यावहारिक हो और जिनसे क्षेत्र के अधिकांश लोग लाभान्वित होते हों। अर्जुन मेघवाल नोखा गये तो वहां के बाशिन्दों की लम्बे समय से चली आ रही उस इच्छा को हवा दे आए जो व्यावहारिक नहीं है। वे नोखा-सुजानगढ़ के बीच लगभग 120 किमी. की रेल लाइन डलवाने का आश्वासन दे आए, जबकि इसे रेलवे आर्थिक तौर पर व्यावहारिक नहीं मानती है। यद्यपि ऐसी ही जरूरत सूबे में बांसवाड़ा क्षेत्र के लोगों की है। सूबे का यह आदिवासी क्षेत्र आजादी बाद से ही रेल सेवा से पूरी तरह वंचित रहा। रेलवे का तर्क था कि आर्थिक हिसाब से यह घाटे का सौदा है। पिछली अशोक गहलोत सरकार ने इसे जरूरी समझा और पूरा खर्च राज्य सरकार द्वारा उठाने की शर्त पर रेलवे से यह परियोजना मंजूर करवा ली। क्या अर्जुन मेघवाल इस स्थिति के लिए तैयार हैं। कोशिश तो उन्हें पुष्कर-मेड़ता सिटी रेल मार्ग की करनी चाहिए जिसका सर्वाधिक लाभ उनके बीकानेर क्षेत्र को होने वाला है। कुल 60 किमी के इस रेल मार्ग के बनने में कई अनुकूलताएं है। रेल लाइन का यह टुकड़ा डलने से पुष्कर जैसा विश्व प्रसिद्ध तीर्थ पंजाब, हरियाणा और जम्मू कश्मीर से सीधे जुड़ता है, इन प्रदेशों से वाया अजमेर उदयपुर और मध्यप्रदेश के मालवा होकर जाने वाली सभी गाडिय़ां बीकानेर होकर जा सकती हैं। अजमेर के सांसद सचिन पायलट की भी इस परियोजना में रुचि है। अशोक गहलोत और मानिकचन्द सुराना जैसी राजनीतिक चतुराई करते हुए अर्जुन मेघवाल क्यों नहीं सचिन पायलट का सहयोग इस परियोजना के लिए लें।
अलावा इसके यहां के रेलवे वर्कशॉप और लोको शेड का नवीनीकरण हो जाने पर क्षेत्र के हजारों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पुन: जुड़ सकते हैं। मेघवाल क्यों नहीं इसके लिए प्रयास करते हैं। रहा कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या का मामला तो राज्य सरकार इसके लिए एलिवेटेड रोड बनाने की घोषणा कर चुकी है और केन्द्र का सड़क परिवहन मंत्रालय धन देने की हामी भर चुका है। बावजूद इस सब के इसमें ढिलाई क्यों हो रही है। सरकार चाहे तो आगामी विधानसभा चुनावों से पूर्व इसे पूर्ण करवाकर शहर की दोनों विधानसभा सीटें भाजपा के लिए फिर से पक्की कर सकती है। विधायक सिद्धिकुमारी ने अपने क्षेत्र के लिए पिछले आठ वर्षों में और कुछ भले ही ना किया हो पर कम से कम इस एलिवेटेड रोड परियोजना के पीछे लग कर वह अपने क्षेत्र की जनता को बड़ी राहत दिला सकती हैं। विधायक गोपाल जोशी भी इसमें पूरा सहयोग करेंगे यह भरोसा करना चाहिए। क्योंकि यह एलिवेटेड रोड बीकानेर पश्चिम और पूर्व विधानसभा क्षेत्रों के बाशिन्दों के लिए समान रूप से  राहत देने वाली होगी।

15 सितम्बर, 2016

Thursday, September 1, 2016

इंजीनियरिंग कॉलेज बीकानेर : ये तो होना ही था।

इंजीनियरिंग कॉलेज बीकानेर इन दिनों फिर सुर्खियों में है। परसों ही प्राचार्य ने कहा था कि गैर शैक्षणिक कर्मचारियों की कोई छंटनी नहीं होगी। चौबीस घंटे गुजरते-न-गुजरते संविदा पर लगे डेढ़ सौ गैर शैक्षणिक कर्मचारियों को परसों वेतन और कल हटने का पत्र थमा दिया गया। उन्हीं प्राचार्य ने कल कह दिया कि मंत्री महोदय का सख्त आदेश था, मानना पड़ा। कहा जा रहा है कि इस संस्थान के लिए गैर शैक्षणिक कर्मचारियों की कुल जरूरत दो सौ थी और रख साढ़े चार सौ लिए। मतलब अधिशेष सौ कि छुट्टी भी लगभग तय ही है। नेताओं की अदूरर्शिता के चलते लगतार विकराल होती जा रही बेरोजगारी के समय में इस तरह हटाने की आई नौबत में ऐसे सभी कर्मचारियों के प्रति पूरी सहानुभूति है। सरकार का स्ववित्त पोषी यह संस्थान छात्रों के अभिभावकों से फीस के रूप में भारी वसूली के बावजूद इसीलिए भारी घाटे में चल रहा है। इस संस्थान की अकादमिक साख भी अब वह कहां रही जो दस-बारह बरस पहले थी।
कभी प्रतिष्ठित रहा यह संस्थान स्थानीय प्रभावी नेताओं की दृष्टिहीनता के चलते अब कार्मिकों को हटाने के ऐसे निर्णय से खलनायक भी लगने लगा है। 'विनायकÓ नेे इसके कारणों का खुलासा और भविष्य के संकेत 23 सितम्बर, 2014 के अपने सम्पादकीय में ही दे दिए थे। पाठकों के लिए सनदी तौर पर उस सम्पादकीय के कुछ अंश साझा करना आज जरूरी लगा। प्रस्तुत है:
इंजीनियरिंग कॉलेज बीकानेर की साख दस साल पहले वाली लौटती नहीं लगती है, लेकिन स्ववित्त पोषित इस सरकारी कॉलेज का माजना इतना तो रहना ही चाहिए कि इसे विद्यार्थी मिलते रहें कि जितनों की फीस से इसे धकाए रखा जा सके! अब करतूतें ऐसी ही हो रही है कि अगले पांच-दस सालों में करोड़ों के इस भवन को खण्डहर में तबदील होने को छोड़ दिया जायेगा। स्ववित्त पोषित है तो सरकार आर्थिक जिम्मेदारी मानती नहीं और ये नेता और जनप्रतिनिधि इस कॉलेज में अपने-अपने आदमियों को घुसाने में इस तरह लगे हुए हैं कि दो सौ कार्मिकों का स्टाफ सरप्लस हो गया। ऐसी विचित्र स्थितियां इस कॉलेज को देखनी पड़ रही है कि उसके अस्तित्व पर ही बन आई। कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही सरकारों के समय से इसे शरणार्थी गृह के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कार्मिकों की जरूरत हो या न हो, इन नेताओं ने जिसका भी कह दिया उसे शरण में लेना पड़ेगा। जो प्राचार्य असमर्थता जताता उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
जनता वोट देने के बाद अपनी जिम्मेदारी खत्म मान कर सब कुछ अपने जनप्रतिनिधियों के जिम्मे मान लेती है। अगर इस तरह की स्थितियों में जनता सावचेत रहे तो नेता दुस्साहस नहीं दिखा सकते। लेकिन आमजन की ट्रेनिंग ऐसी रही नहीं है। अत: अब जो, जैसे और जितने भी इंजीनियरिंग कॉलेज से तनख्वाह पाते हैं उन्हें एकजुट होकर इसे बचाने की कवायद में लगना होगा अन्यथा स्ववित्त पोषित इस संस्थान का जो हश्र होना है सो होगा, उनकी आजीविका भी ताक पर चढ़े बिना नहीं रहेगी।
नेताओं और जनप्रतिनिधियों के अनावश्यक हस्तक्षेप ने इस अच्छे-भले कॉलेज का हाल ऐसा कर दिया कि इंजीनियरिंग की ओर घटते रुझान के बाद तो इसे विद्यार्थी मिलने के सांसे हो जायेंगे। पैसे देकर पढऩे वाला कोई ऐसे माहौल में आयेगा ही क्यूं? सरकार ने कभी किसी दबाव में कोई आर्थिक पैकेज दे भी दिया तो उससे होना जाना क्या है। कॉलेज को खड़ा तो अपने पैरों पर ही रखना होगा। इस प्रतिष्ठित कॉलेज से शहर की उम्मीदें इस तरह सांस उखड़ती दिखने लगेंगी, नहीं सोचा था।

1 सितम्बर, 2016