Thursday, January 4, 2018

भाजपा नेता सुरेन्द्रसिंह शेखावत का पत्र न्यास अध्यक्ष महावीर रांका के नाम

बीते सप्ताह 27 दिसम्बर को घड़सीसर क्षेत्र में नगर विकास न्यास ने अपनी चालीस बीघा भूमि अतिक्रमणकारियों से मुक्त करवाई। ठिठुराती सर्दी के इस मौसम में संवेदनहीन तरीके से की गई कार्रवाई को अगले ही दिन 'विनायक' ने अपने सम्पादकीय में सभी आयामों से उठाया। लगभग इन्हीं आपत्तियों के साथ भाजपा के युवा नेता सुरेन्द्रसिंह शेखावत ने एक पत्र नगर विकास न्यास अध्यक्ष महावीर रांका को लिखा।
इस पत्र को सार्वजनिक भी किया गया। किसी के नाराज होने के भय तथा चापलूसी-दौर के चलते इस तरह के विमर्श की गुंजाइश आजकल की राजनीति में लगभग गायब हो गयी है। ऐसे में यह पत्र कइयों को उदबुदा लगा। पूरे पत्र में ना कहीं अनुशासनहीनता की शब्दावली है और ना ही ऊंचा-नीचा दिखाने का कोई भाव। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ना केवल इस तरह के विमर्श की गुंजाइश होनी चाहिए बल्कि शेखावत जैसे संजीदा नेताओं से प्रेरणा लेकर दूसरों को भी अपनी असहमति पर खुलकर मुखर होना चाहिए। ऐसे विमर्श लोकतंत्र की जड़ों के लिए खाद-पानी का काम करते हैं। स्वस्थ आलोचना से बचकर हम अपने परिक्षेत्र को लगातार अस्वच्छ ही बना रहे होते हैं।
दीपचन्द सांखला

04 जनवरी, 2018

भीमा-कोरेगांव की घटना के बहाने

महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव स्मारक पर आयोजित कार्यक्रम में भड़की हिंसा के बाद पूरे पश्चिमी महाराष्ट्र में तनाव व्याप्त है। 200 वर्ष पूर्व 1 जनवरी, 1817 को अंग्रेजों और मराठों के बीच हुए युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ रहे दलित समुदाय के सैनिक विजयी हुए। यह युद्ध ऐतिहासिक इसलिए माना जाता है कि इसमें मात्र 800 दलित सैनिकों ने मराठों के 28,000 सैनिकों को हरा दिया। यह उस काल की बात है जब दलितों की सामाजिक स्थिति पशुवत थी, वे उच्च वर्ण के सामने आंख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं रखते थे। वहीं मराठों का शासन पेशवाओं के चंगुल में आने के बाद निम्न वर्गों पर अत्याचार और बढ़ गये थे। ऐसे में दलित चाहे वे अंग्रेजों की ओर से ही लड़े हों, युद्ध की जीत उनके आत्मबल में इजाफा करने वाली थी। इस जीत पर अंग्रेजों ने वहां एक विजय स्तंभ का निर्माण करवाया, बाद में उसी स्थल पर प्रतिवर्ष 1 जनवरी को उस जीत की स्मृति से आत्मसम्मान के सुख की अनुभूति करने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक इक_ा होने लगे। अन्य सभी पर्वों की तरह यह आयोजन भी रूढ़ होता गया। गत एक जनवरी 2018 को चूंकि उस घटना की 200वीं जयंती थी, सो इस बार काफी बड़ा आयोजन था। लेकिन इस बार राज की इस अनुकूलता में कुछ दक्षिणपंथी समूहों की हेकड़ी जाग गई और उन्होंने 200 वर्षों से हो रहे इस आयोजन का हिंसक विरोध करने की ठान ली। माहौल इसीलिए खराब हुआ।
आगे बात करने से पूर्व यह स्पष्ट कर दें कि हिंसा से हासिल किसी भी जीत के जश्न को सैद्धान्तिक तौर पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन हमारे देश में बहुत से जश्न हिंसा से हासिल जीत से गौरवान्वित होने में रूढ़ हो गए हैं, तो वैसा ही एक आयोजन यदि दलित अपने आत्मसुख के लिए कर रहे हों तो अन्यों को एतराज नहीं होना चाहिए। लेकिन वर्तमान शासन में दक्षिणपंथियों को अपनी दबंगई की अनुकूलता दिखने और छीजती अपनी हेकड़ी को पुन: सहेजने का उचित अवसर लगने लगा है। यहां यह भी समझना जरूरी है कि दक्षिणपंथ मुख्यत: उच्च जाति वर्गीय समूहों का हित पोषक है। जिसकी बानगी में पद्मावती प्रकरण के बाद भीमा-कोरेगांव की हिंसक घटना को देख सकते हैं। सामाजिक समानता हेतु हो रहे बदलावों को ठेंगा दिखाती इस तरह की घटनाओं को सरकारें भी अनुकूलता देने लगी, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में और भी खतरनाक है।
दक्षिणपंथ की पोषक वर्तमान सरकार ऐसी घटनाओं से ना कड़ाई से निबटती है और ना ही सख्ती से इन्हें भुंडाती है। गो-रक्षा के नाम पर दलितों-अल्पसंख्यकों पर हिंसक हमले अन्य उदाहरणों में देख सकते हैं।
आजादी बाद के इन सत्तर वर्षों में देश ने सामाजिक और साम्प्रदायिक समरसता जैसी-तैसी भी सहेजी है, उसे बनाए रखने की जिम्मेदारी भारत देश के संविधान के अन्तर्गत सत्ता हासिल करने वाली पार्टी की ही बनती है। लोकतांत्रिक मूल्यों का तकाजा भी यही है।

लोकतंत्र में चौथा स्तंभ माने जाने वाला मीडिया भी पूरी तरह धर्मच्युत होता लग रहा है। उक्त घटना की मीडिया रिपोर्टिंग पर देश के जाने-माने पत्रकार ओम थानवी की सोशलसाइट्स पर दी गई यह टिप्पणी इसे समझने के लिए पर्याप्त है। 'उंची जातियों के लोग मीडिया में भरे पड़े हैं और उनका क्षुद्र जातिगत पूर्वग्रह ऐसे मौके पर अक्सर विवेक खो देता है।' यहां यह बताना भी जरूरी है कि ओम थानवी उच्च जातिवर्ग से आते हैं। 
दीपचन्द सांखला

04 जनवरी, 2018

Thursday, December 21, 2017

एलिवेटेड रोड योजना : इस अधूरे समाधान का जिम्मेदार कौन

अपने दकियानूस पुरुष प्रधान समाज के स्थानीय लोक में एक कहावत प्रचलित है—'काणी रे ब्याव में सो जोखा' यानी एक आंख वाली कन्या का जाहिर किए बिना विवाह करना हो तो उसमें सौ जोखिम होती है। ठीक यही बात बीकानेर कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या के समाधान में चरितार्थ हो रही है। शहर इस समस्या से बुरी तरह पीडि़त है लेकिन शासन, प्रशासन और शहर की नुमाइंदगी का दम भरने वाले किसी नेता को कभी इस पर गंभीर होते नहीं देखा गया। तब से ही नहीं जब 1990 बाद से समस्या पर पूर्व विधायक आरके दास गुप्ता सक्रिय हुए। चूंकि गुप्ता शुरू से ही बायपास जैसे अव्यावहारिक और असंभव समाधान के आग्रही रहे, कुछ नेता और अवसरवादी समर्थ तो उसके इसी समाधान में अपने हित की गोटियां बिठाने में लग गये, बिना ये विचारे कि बायपास व्यावहारिक भी है कि नहीं।
धन्यवाद तो 2005-06 में भाजपा की तब की वसुंधरा सरकार के समय आरयूआईडीपी की उस टीम को जिसके मुखिया से लेकर कर्ता-धर्ता सभी इस चेष्टा में लगे कि इसका संभव और व्यावहारिक समाधान क्या हो। उन्होंने समाधान के तौर पर एलिवेटेड रोड की योजना बनाकर सरकार को सौंपी भी। लेकिन बायपास के 'कड़ी-पकड़ों' ने तब इसे अंजाम तक नहीं पहुंचने दिया।
2008 से 2013 तक प्रदेश में कांग्रेस का शासन था। चुनाव हार चुके कांग्रेसी डॉ. बीडी कल्ला अपना राज होते भी निढ़ाल होकर निष्क्रिय हो लिए, कुछ करते भी तो वे बायपास ही का राग अलापते! इस तरह कांग्रेस के खाते में इस समस्या के समाधान का श्रेय नहीं डाला जा सकेगा। इस तरह बीते दस वर्षों में बढ़ती और विकराल हो चुकी इस समस्या पर अब कवायद फिर शुरू हुई है।  लेकिन जिस तरह की राज की व्यवस्था हो गई है उसमें 2005-06 वाली योजना का कोई अता पता ही नहीं। जनता का पैसा सरकार में जाकर जिस आवारगी से खर्च होता है उस ढर्रे में इस योजना को फिर से बनाने का काम निजी कम्पनियों को सौंपा गया। 'किसकी भैंस कौण नीरे' की तर्ज पर लगभग एक वर्ष से फोरलेन, थ्री-लेन की बनते-बनते यह योजना टू-लेन विद पेव्ड सोल्डर के बहाने 12 मीटर पर आ अटकीलेकिन है अब भी अधूरी।
दरअसल कोटगेट क्षेत्र के यातायात में महात्मा गांधी रोड से गुजरने वाला साठ प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भीतरी शहर से कोटगेट होते हुए आने-जाने वालों का होता है। नई बनी इस एलिवेटेड योजना में इसे ही पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। भीतरी शहर के यातायात को एलिवेटेड रोड की सुविधा देने के लिए 2005-06 के स्थानीय योजनाकारों ने तब इसका एक सिरा राजीव मार्ग पर उतारना तय किया था जिसे इस बार गायब कर दिया गया है। इस तरह यदि इसी योजना के तहत एलिवेटेड रोड बनती है तो वह समाधान अधूरे से कम ही कर पायेगी।
चौड़ाई जैसे बदलावों के साथ एलिवेटेड रोड यदि पुराने प्रारूप में बनती है तो बीकानेर के (पूर्व और पश्चिम दोनों) दोनों विधानसभा क्षेत्रों के बाशिन्दे इससे लाभान्वित होंगे। बावजूद इसके शहर के दस वर्षों से विधायकद्वय लगभग उदासीन देखे गये। पूर्व की विधायक सिद्धिकुमारी के वैसे भी अपने क्षेत्र से कोई खास सरोकार कभी देखे नहीं गये लगभग वैसा सा ही मिजाज पश्चिम विधायक गोपाल जोशी का है, अन्तर इतना ही है कि गोपाल जोशी का चेहरा शहरियों को दीखता रहता है, सिद्धिकुमारी का तो वह भी नहीं। इन दोनों ही विधायकों के खाते में शहर के विकास को लेकर कोई उल्लेखनीय काम दर्ज नहीं किया जा सकता सिवाय श्मशानों और सामुदायिक भवनों के जो प्रकारान्तर से संबंधित समाजों का दायित्व है। जिन्हें ये अपने कोटे का दुरुपयोग कर वोट समूहों को पुख्ता करने का वहम पालते हैं।
गोपाल जोशी पिछले एक अरसे से कहने को एलिवेटेड रोड समाधान पर अनुकूल देखे गये लेकिन कहा जा रहा है कि उनकी रुचि इसमें ज्यादा थी कि एलिवेटेड रोड का स्टेशन वाला सिरा उनकी दुकान से पहले ही उतर जाए। बस इसी बदलाव में तकनीकी कारणों से उसका राजीव गांधी मार्ग वाला सिरा योजना से गायब हो गया। कहा यह भी जा रहा है कि सानिवि मंत्री इस योजना के लिए जब बीकानेर आए तब सर्किट हाउस में गोपाल जोशी ने अकेले की गुफ्तगू में उनसे पक्का आश्वासन ले लिया कि एलिवेटेड रोड का भराव वाला (Embankmenk) हिस्सा उनकी दुकान के आगे नहीं आना चाहिए। पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि 2005-06 वाली और अभी पहले बनी योजना में एलिवेटेड रोड का स्टेशन वाला सिरा मोहता रसायन शाला के आगे तक जाना था। यदि ऐसा होता तभी उसका राजीव गांधी मार्ग वाला सिरा बनना तकनीकी तौर पर संभव हो पाता। तकनीकि विशेषज्ञों द्वारा दुर्घटनाओं की दुहाई देना बहाना है, राज जैसा चाहता है, योजना उसी अनुसार बन जाती है।
इस समाधान की तकनीकी व्यावहारिकता पर एक सुझाव तो सात दिसम्बर के अपने आलेख में दिया था। दूसरा, जिसमें दुर्घटना की आशंका और भी कम हो सकती है, वह यह कि राजीव मार्ग से एलिवेटेड रोड पर जाने के लिए वन-वे रोड बनाई जाए और एलिवेटेड रोड से राजीव मार्ग पर आने के लिए स्टेशन रोड स्थित आबकारी विभाग के आगे से डाइवर्टेड एलिवेटेड रोड भी निकाली जा सकती है। लेकिन तब इस रोड का भराव-हिस्सा मोहता रसायन शाला तक ले जाना होगा।
वर्तमान पश्चिम विधायक अपनी अनुकूलता के साथ अपने विधानसभा क्षेत्र के बाशिन्दों की सुविधा का खयाल भी करते तो वे इसे बिस्किट गली तक समाप्त करवाते हुए सरकार से ऐसी योजना भी बनवा सकते थे जिससे शहर के भीतरी यातायात को एलिवेटेड रोड का लाभ मिल पाता।
विधायक गोपाल जोशी अब भी चाहें तो त्यागी वाटिका के पास स्थित सीएमएचओ और स्काउट गाइड कार्यालयों के बीच से होते हुए फोर्ट स्कूल मैदान पीछे के सादुल स्कूल मैदान वाले सिरे की तरफ सड़क निकलवा कर उसे राजीव मार्ग के अणचाबाई अस्पताल डाइवर्जन से मिलवाने की योजना भी साथ ही साथ पारित करवा सकते हैं। यदि गोपाल जोशी ऐसा करवाते हैं तो कम से कम इस योजना में करवाए गये बदलाव के चलते स्वार्थी होने के कलंक से वे कुछ हद तक मुक्त हो सकते हैं अन्यथा यह शहर उन्हें हमेशा कोसेगा। अगला चुनाव चाहे उन्हें नहीं लडऩा हो लेकिन उनके बेटे-पोते कभी लड़ेंगे तो जवाब उन्हें देना होगा।
इस शहर की बड़ी प्रतिकूलता यही है कि विकास की उत्कट इच्छा करने वाला कोई जनप्रतिनिधि इसे अभी तक नहीं मिलाराजकुमार किराड़ू, गोपाल गहलोत, विजय आचार्य, यशपाल गहलोत, जेठानन्द व्यास, अविनाश जोशी, विजयमोहन जोशी आदि-आदि भी शहर की नुमाइंदगी करने की इच्छा को तो पाले दिखते हैं लेकिन इनके पास भी इस शहर के विकास का ना तो कोई खाका है और ना ही कोई तकलीफ। बस रुतबा मिल जाए, इससे ज्यादा कुछ विजन (दृष्टि) इनमें से किसी में भी नहीं दिखता।
दीपचन्द सांखला

21 दिसम्बर, 2017

Sunday, December 10, 2017

मध्यप्रदेश के पत्रकार जीतेन्द्र सुराना की पोस्ट : यह दौर आपातकाल से ज्यादा इस तरह भयावह है।


मैंने आपातकाल में भी पत्रकारिता की थी। जी हाँ 1975 से लेकर 1978 तक मैं मंदसौर से प्रकाशित दैनिक दशपुर दर्शन का नीमच संवाददाता था और अखबार के संपादक थे सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार बालकवि बैरागी के अनुज श्री विष्णु बैरागी।
आपातकाल के उस दौर में एक दिन मैं अपनी साइकिल से नीमच के थाने के सामने से गुजर रहा था।मैंने वहाँ देखा कि थाने के खुले मैदान में एक लड़का और लड़की बैडमिंटन खेल रहे हैं और बैडमिंटन की नेट पकड़ कर खड़े हैं पुलिस के दो जवान! उस समय मेरी उम्र जरूर 20 वर्ष के आसपास थी लेकिन वो दृश्य देखकर मेरा न्यूज़ सेंस एकाएक जाग गया! मैं थाने में प्रवेश कर गया और वहाँ मौजूद दीवानजी  से बैडमिंटन खेल रहे बच्चों के ,एवं नीमच थाने के कुल पुलिस बल के बारे में जानकारी ली।
अगले ही दिन दशपुर दर्शन के मुख पृष्ठ पर समाचार प्रकाशित हो गया।उस समाचार में पुलिस स्टाफ की भारी कमी के साथ प्रमुख बात थी "मंदसौर के एसपी उत्पल के बच्चे नीमच के सेंट्रल स्कूल में पढ़ने के लिए एक निजी बस चित्तोड़-अरनोद, से आते हैं।स्कूल की छुट्टी और बस के मंदसौर वापसी के बीच करीब दो घंटे का अंतराल रहता था इस दौरान बच्चे थाना परिसर में ही रहते थे और चूंकि बच्चे एसपी साहब के थे तो पूरा स्टाफ उनकी सेवा और देखभाल में लगना स्वाभाविक ही था सो समाचार में पुलिस स्टाफ की कमी के साथ ही आरक्षकों की अलग अलग जगह लगने वाली ड्यूटी के साथ यह बात भी प्रमुखता से प्रकाशित हुई कि स्टाफ की कमी के बावजूद एसपी उत्पल के बच्चे जब थाना परिसर में बैडमिंटन खेलते हैं तो पुलिस के दो जवान नेट पकड़कर अपनी ड्यूटी बजाते हैं!
एसपी और उनके बच्चों को लेकर इस तरह की खबर छपने के बाद स्वाभाविक है बवाल तो मचना ही था। उस समय नीमच के एसडीओ पुलिस थे स्वराज पुरी(जो कि बाद में मध्यप्रदेश के डीजीपी बने) उन्होंने मुझे इस समाचार पर मेरा बयान लेने के लिए उनके कार्यालय पर बुलाया।संपादकजी से चर्चा की तो उन्होंने आश्वस्त किया कि डरने की कोई बात नही है,बेख़ौफ़ होकर बयान दो!मैं बयान देने पहुंचा और स्वराज पूरी ने मुझसे फुसलाकर यह उगलवा लिया कि पुलिस बल की संख्या की जानकारी किसने दी तो मैंने बचपने में पुलिस के दीवानजी बनेसिंहजी का नाम बता दिया। दूसरे दिन मुझे पता चला कि पुरी साहब ने उन दीवानजी को लाईन हाजिर कर दिया है।
लेकिन आपातकाल के उस आतंक के माहौल में पुरी जैसे दबंग आईपीएस की हिम्मत नही थी कि मुझ जैसे एक कम उम्र के नौजवान पत्रकार पर हाथ डाल दे!
और अब देखिए आज का दौर जबकि नीमच से 350 किमी दूर खरगोन में मेरे फेसबुक मित्र वहां के डीआईजी ए के पांडे को शासन के एक निर्णय पर कसे एक व्यंग और तंज पर इतना बुरा लग जाता है कि खरगोन थाने में मेरे विरुद्ध बलात्कार सहित कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हो जाता है! यह है आज को दौर जो शायद आपातकाल से भी कई गुना बदतर है!

Thursday, December 7, 2017

आधा-अधूरा एलिवेटेड रोड : डा. गोपाल जोशी और सिद्धिकुमारी के लिए धर्म निभाने और रुतबा दिखाने का अवसर

बीकानेर शहर की बड़ी प्रतिकूलता यह रही है कि इसे अभी तक ऐसा कोई जनप्रतिनिधि नहीं मिला जो इसके विकास की समझ रखता हो, कुछ करने-करवाने का इतना जुनून रखता हो कि उसे सपने भी इससे संबंधित ही आएं। वोट लेने आने वाले दावे तो कई करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उनके दावों का हश्र वही होता है जो उनकी पार्टी के चुनावी घोषणापत्रों का होता है। जीते हुए प्रतिनिधियों के काल में रूटीन में कुछ कार्य हुए तो अगले चुनावों में उन्हीं की सूची बना वोट लेने फिर हाजिर हो जाते हैं।
पिछले पचीस से ज्यादा वर्षों से कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या पर शहर में खदबदाहट है। समाधान पर असहमतियों के बावजूद इसका उल्लेख जरूरी है कि पूर्व विधायक एडवोकेट रामकृष्ण दास गुप्ता लगातार मोर्चे पर डटे हुए हैं। एलिवेटेड रोड जैसे इस व्यावहारिक समाधान को लेकर लूनकरणसर से विधायक मानिकचन्द सुराना की सक्रियता भी उल्लेखनीय है। लेकिन मजाल है कि शहर का कोई जनप्रतिनिधि इस मसले पर पूरे मन से व्यावहारिक तौर पर सक्रिय हुआ हो।
इसीलिए इस आलेख के शीर्षक में शहर के दोनों विधायकों का आह्वान किया है। दस-बारह वर्षों से ही सही समस्या का सर्वाधिक व्यावहारिक समाधान एलिवेटेड रोड किसी मुकाम तक पहुंचता दीख रहा है, लेकिन आधा-अधूरा। सरकारी कामों में बिगड़े तारतम्य का यह अनोखा उदाहरण है। 2005-06 में इन्हीं वसुंधरा राजे के शासन में एलिवेटेड रोड की योजना बनी, तब यह काम आरयूआईडीपी को दिया गया। तब इसके मुखिया सरदार अजित सिंह ने, जिन्होंने केन्द्र के परिवहन मंत्रालय के मुख्य अभियंता पद से सेवानिवृत्त होकर यह जिम्मेदारी संभाली, इस योजना का प्रारूप बनाने के लिए स्थानीय अभियन्ताओं का सहयोग लियाहेमन्त नारंग और अशोक खन्ना की सेवाओं और रेलवे के एन. के. शर्मा की सलाह से तब जो योजना बनी वह पूर्ण व्यावहारिक थी।
बात अब दुबारा बनी एलिवेटेड योजना के मिनिट्स के हिसाब से कर लेते हैं, महात्मा गांधी रोड जिसे केईएम रोड भी कहा जाता है, पर आवागमन करने वाला यातायात लगभग 60 प्रतिशत से ऊपर वह है जिसे कोटगेट के भीतर की ओर से आना और जाना होता है। इसी के मद्देनजर कोटगेट की तरफ आने-जाने वालों की सुविधा का ध्यान रखते हुए तब बनी योजना में एलिवेटेड रोड का एक सिरा राजीव मार्ग पर उतारा गया था। यानी शार्दूलसिंह सर्किल, रेलवे स्टेशन और राजीव मार्ग इन तीनों सिरों के साथ तब बनी योजना कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या का समाधान अधिकांशत: करती। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सौ फीसदी समाधान की तकनीक विज्ञान अभी तक विकसित नहीं कर पाया है। अत: अधिकतम पर सन्तोष करना लाचारी है।
अब जब यह समाधान सिरे चढ़ता दीख रहा है तो आधा-अधूरा। आधा-अधूरा इसलिए कि अब बनी योजना में राजीव मार्ग वाले सिरे को गायब कर दिया गया है। ऐसे में इस अधकचरे समाधान पर शहर अपने को ठगा महसूस क्यों ना करें? दरअसल इस योजना की जो कंसल्टिंग एजेन्सी आईसीटी है, ऐसा लगता है वह इसे शुद्ध राष्ट्रीय राजमार्ग के तौर पर ही देख-समझ रही है। शायद उसे इसी तरह देखना समझाया गया हो। जबकि इस योजना को राष्ट्रीय राजमार्ग के तौर पर देखने का मकसद मात्र केन्द्र से वित्तीय संसाधन जुटाना भर ही है। असल में तो यह शहरी यातायात की समस्या है। इसलिए होना तो यह चाहिए था कि इसे उसकी असल जरूरतों के अनुसार ही बनाया जाता। चूंकि कंसल्टिंग एजेन्सी इसे राष्ट्रीय राजमार्ग के तौर पर ही देख रही है इसलिए राजीव मार्ग के तिराहे से वह इसलिए बचना चाह रही है कि इससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ेगी, यह सही भी है। यदि यह एलिवेटेड रोड राष्ट्रीय राजमार्ग पर होता तो तेज रफ्तार के चलते दुर्घटना की आशंकाएं होती भी।
लेकिन यह एलिवेटेड रोड तो शहर के उस हिस्से में बनना है जहां यातायात की रफ्तार ही सामान्यत: 20-25 कि.मी. के ऊपर की संभव नहीं है। जयपुर का उदाहरण लें तो तेज रफ्तार जयपुर-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर ट्रांसपोर्ट नगर के बाद जो फ्लाइओवर बना है उसमें से एम.आई. रोड की तरफ जाने के लिए तीसरा सिरा निकाला गया। यह सुविधा शहर के उस बाहरी हिस्से में विकसित की गई है जहां भारी वाहनों के साथ यातायात की रफ्तार सामान्यत: तेज रहती है। बीकानेर कोटगेट क्षेत्र में तो यातायात इससे आधी रफ्तार में भी नहीं होगा और भारी वाहनों के आवागमन का तो कोई मसला भी नहीं है।
बीकानेर शहर की इस समस्या के अधिकतम समाधान के लिए एलिवेटेड रोड का राजीव मार्ग वाला सिरा 'टू-वे' रखना भी जरूरी है, यह सावचेती इसलिए जरूरी है कि कंसल्टिंग एजेन्सी कल को कहीं 'वन-वे' का ही विकल्प दे।
राजीव मार्ग वाला सिरा 'टू-वे' रखना तकनीकी तौर पर संभव है। इस एलिवेटेड रोड योजना में कुल चौड़ाई आधार मार्ग के संकरेपन के चलते 12 मीटर ही तय हो पाई है। लेकिन नागरी भण्डार के आगे जहां राजीव मार्ग वाला सिरा एलिवेटेड रोड से मिलेगा, वहां के आधार मार्ग की चौड़ाई अन्य सड़कों की चौड़ाई से ज्यादा है, ऐसे में एलिवेटेड रोड पर बनने वाले इस तिराहे के तीनों ओर पर्याप्त तकनीकी दूरी तक एलिवेटेड रोड की चौड़ाई 14 मीटर (जो बिना तोड़-फोड़ के संभव है) कर आगे 12 मीटर में मिलान की जा सकती है। अलावा इसके इस तिराहे पर संभावित दुर्घटनाएं रोकने के लिए तीनों ओर 14 मीटर की चौड़ाई तक मैटल बीम क्रेश बेरियर (एम सी बी) का डिवाइडर दिया जा सकता है। इसके साथ ही एलिवेटेड रोड के इस तिराहे पर ट्रेफिक लाइटें लगा कर तथा 14 मीटर के 'टू-वे' पर एक तरफ मिल रही साढ़े पांच मीटर सड़क पर मीडियेटर लेन डालकर भी यातायात को संयमित किया जा सकता है। ऐसे में एलिवेटेड रोड के तिराहे को तकनीकी तौर पर खारिज करना उचित नहीं लगता।
इतनी सब खेचल का मकसद यही है कि जब काम हो ही रहा है तो अधिकतम सुविधावाला हो। और इसके लिए शहर अपने जनप्रतिनिधियों से उम्मीदें नहीं करे तो किनसे करेगा? बीकानेर पश्चिम विधायक डा. गोपाल जोशी और बीकानेर पूर्व विधायक सुश्री सिद्धिकुमारी के लिए विशेष ध्यानार्थ ही इसका शीर्षक लगाया है। इस एलिवेटेड रोड का अधिकांश हिस्सा चाहे बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में हो लेकिन सिद्धिकुमारी को ध्यान होना चाहिए कि इस एलिवेटेड रोड का उपयोग करने वालों में 20 से 25 प्रतिशत वे लोग भी होंगे जो पूर्व विधानसभा क्षेत्र के मतदाता हैं और जिन्हें किसी ना किसी काम से कोटगेट के अन्दर और रेलवे स्टेशन की ओर आने-जाने का काम पड़ता है।
दीपचन्द सांखला

07 दिसम्बर, 2017

Thursday, November 30, 2017

गुजरात चुनाव : जुझार कांग्रेस और आकळ-बाकळ भाजपा

दिसम्बर के पहले पखवाड़े में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव अपने उत्सुकी दौर में पहुंच गये हैं। देश-समाज और राजनीति में रुचि रखने वाले प्रत्येक भारतीय के लिए 18 दिसम्बर को आने वाला चुनाव परिणाम किसी कौतुक से कम नहीं होगा। हालांकि उसी दिन हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों का परिणाम भी आना है, लेकिन जैसी कौतुकी प्रतीक्षा गुजरात चुनाव परिणामों के लिए होगी वैसी हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणामों के लिए नहीं होगी।
बीते 22 वर्षों से गुजरात में कहने को भाजपा का शासन है, लेकिन लगभग 19 वर्षों तक वहां शासन नरेन्द्र मोदी ने पार्टी से ऊपर होकर किया है। गुजरात छोड़ केन्द्र की राजनीति में आने से पूर्व तक अति-महत्त्वाकांक्षी और हेकड़ीबाज मोदी को यह भान ही नहीं होगा कि वह जिस आडम्बरी आवरण में गुजरात को संजोए हुए थेउनके जगह छोड़ते ही वह अनावृत होने लगेगा। इस तरह के आकलन को चुनाव परिणामों की घोषणा ना मानें। मगर विधानसभा चुनावों के मद्देनजर गुजरात में जो राजनीतिक परिदृश्य बना है, उसे अपनी तरह से देखने की एक कोशिश जरूर है।
डेढ़-दो माह पूर्व तक गुजरात के चुनावी परिदृश्य के जो अनुमान थे, वह सब ओझल होने लगे हैं। अचानक लगने वाला यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं था। अपने पंजाब प्रभार के समय भी कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत ने ऐसे हालातों में ही अपनी पार्टी के लिए अनुकूलता बनाई लेकिन उसका उल्लेख इसलिए नहीं हुआ क्योंकि वहां सत्ता विरोधी लहर इतनी प्रबल थी कि गहलोत को श्रेय मिल नहीं पाया। पंजाब में भी इस बात की प्रबल संभावना थी कि सत्ता विरोधी लहर का लाभ आम आदमी पार्टी ले जा सकती थी, जिसे संभव नहीं होने दिया गया।
गुजरात की स्थितियां कमोबेश भिन्न हैं, यहां हाल तक मोदी के बनाए आडम्बरी आवरण के चलते सत्ता विरोधी लहर वैसी दिखाई नहीं दे रही थी जैसी कि पंजाब में। स्वयं मोदी को भी ये भान नहीं था कि विकास के गुजरात मॉडल के गुब्बारे की हवा यूं निकल जाएगी, बावजूद इस सबके, गुजरात में सत्ता विरोधी लहर से इनकार नहीं किया जा सकता। इसे 2012 के विधानसभा चुनाव परिणामों से समझ सकते हैं कि जब सांगठनिक तौर पर लगभग लुंज-पुंज कांग्रेस को तब भी 182 में से 57 सीटें मिली थी। कांग्रेस यदि तब आज जैसे जोशो-खरोश में होती तो सरकार भले ही ना बना पाती, विधानसभा में बराबरी का जोर जरूर करवा देती। कांग्रेस में आज के जोश-खरोश का श्रेय प्रभारी महासचिव अशोक गहलोत को जाता है। वे पिछले एक वर्ष से मृतप्राय संगठन को तहसील स्तर तक संजीवन देने में जुटे हैं। अलावा इसके, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस का प्रभावी चुनाव अभियान और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बदले किरदार के लिए भी अशोक गहलोत की संगत का असर मानने में संकोच नहीं करना चाहिए। इस जुझारू चुनाव अभियान के बावजूद गुजरात में कांग्रेस पार्टी सरकार बना लेगी या नहीं, यह चुनाव परिणामों पर निर्भर करेगा। सरकार यदि ना भी बन पाए तो कांग्रेस के लिए गुजरात चुनावों की बड़ी उपलब्धि राहुल का बालिग हो जाना माना जा सकता है। ये भी उल्लेखनीय कम नहीं है कि गुजरात के पिछले तीन विधानसभा चुनावों का मुख्य मुद्दा हिन्दू-मुसलमान ही रहा है लेकिन इस बार ये मुद्दा हाल तक सिरे से गायब है। हालांकि कुछ भी पार पड़ती नहीं देख भाजपा अपने इस पुराने तरीके को आजमाने की तजबीज में लगी हुई है।
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के कांग्रेस अभियान का स्मरण करें तो राहुल गांधी में आए इन बदलावों को अच्छे से समझ सकते हैं। उत्तर प्रदेश में तब चाहे उन्होंने यात्रा की हो या चुनावी रैलियां, राहुल के हाव-भाव से यही लगता था कि उन्हें खुद पर भी भरोसा नहीं है, वहीं जनता में भी राहुल को लेकर कोई खास उत्साह नहीं देखा जाता था। सकारात्मक माहौल जननेता और जनता की परस्पर की कैमिस्ट्री से बनता है। जननेता होते जा रहे राहुल के सन्दर्भ से ऐसी कैमिस्ट्री गुजरात में अब देखी जाने लगी है।
वहीं कांग्रेस से उलट कैडर आधारित कहलाने वाली भाजपा जब से मोदी एण्ड शाह एसोसिएट बनीतब ही से कैडर की हैसियत कलपूर्जों से अधिक की नहीं देखी जा रही। मुद्दे में सावचेत संघ लगातार मिल रही सफलताओं और असल एजेन्डे के लिए बनती अनुकूलता के आभास से मुग्ध है तो नरेन्द्र मोदी भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री हो लेने भर की खुमारी से ही निकल नहीं पा रहे। स्थानीय कहावत में समझें तो जैसे सेर की हांडी में सवासेर ऊर दिया गया हो। असल में कहें तो संघ और मोदी की इस मुग्धता ने अमित शाह को बहुत कुछ की गुंजाइश दे दी है। अमित शाह निजी फर्म की मानिन्द पार्टी को जिस तरह चलाने लगे हैं उससे लगता है कि वे अब संघ और मोदी दोनों पर हावी हैं। कभी वे ठिठकते लगते भी हैं तो यह उनकी रणनीति का ही हिस्सा माना जा सकता है।
गुजरात चुनाव के परिणाम अगले वर्ष होने वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों को तो प्रभावित करेंगे ही, 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों की आधार भूमि भी तय करेंगे। गुजरात में कांग्रेस अगर जीतती है तो मोदी-शाह के तौर-तरीकों पर पार्टी के भीतर से आवाजें मुखर होने लगेगी। ऐसी पूरी संभावना है वहीं कांग्रेस ऐसी अनुकूल परिणामों के बाद न केवल आगामी विधानसभा चुनावों में पूरे आत्मविश्वास के साथ उतरेगी वरन् लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए भी जोशो-खरोश जुटा लेगी।
दीपचन्द सांखला

30 नवम्बर, 2017

Thursday, November 16, 2017

डॉक्टरों की हड़ताल और फिल्म पद्मावती के बहाने अपने समाज को आईने में देखने की कोशिश

समाज को स्वयं के अवलोकन के लिए किसी बाहरी-भौतिक आईने की जरूरत नहीं होती। कोई  ऐसा प्रयास कर भी रहा है तो वह या तो अपने को बहला रहा होता है या खुद ही को धोखा दे रहा है। चूंकि समाज बहुआयामी होता है अत: उसका एक आयाम दूसरे के आईने की भूमिका निभा रहा होता है। बस जरूरत इतनी ही है कि हम ऐसे विवेक को अपने में साध लें। प्रतिकूलता यही है कि इस दौर में ऐसा विवेक समाज से लगातार गायब होता जा रहा है।
हाल के दो आन्दोलनों से इसके आकलन और समझ से रू-बरू हो सकते हैं। पहला, राजस्थान में सरकारी सेवारत डॉक्टरों की हड़ताल और दूसरा संजय लीला भंसाली की आने वाली फिल्म पद्मावती के हो रहे भयावह विरोध से।
डॉक्टरों और शासन के बीच समझौता हो चुका है और डॉक्टर काम पर लौट आए हैं। ऐसी घटनाओं के अच्छे-बुरे परिणामों को भूलने की समय सीमा इस दौर में जिस गति से सिकुड़ रही है, उस पर विचारने से चिन्ता होने लगती है कि इस तरह संवेदनाएं समाज में बचेंगी भी कि नहीं। (बुरे परिणामों में वे खबरें हैं जिनसे मालूम होता है कि डॉक्टरों की इस हड़ताल के चलते कई मरीज इलाज के अभाव में मर गये।)
डॉक्टरों की यह हड़ताल टूटने से एक दिन पूर्व के अपने ट्वीट को साझा कर रहा हूं। डॉक्टरों को उनकी इस हड़ताल के लिए भुंडाए जाने पर चाहें तो इस ट्वीट से पूरे परिदृश्य का आकलन कर सकते हैं।
राजस्थान में डॉक्टरों की हड़ताल : जिस समाज का प्रत्येक समर्थ घोर लालच और स्वार्थ की लालसा मन में रखने लगा हो, वहां डॉक्टरों से तो क्या, किसी से भी मानवीय होने की कामना बेमानी है।
इसे और खोलकर कहने की गुंजाइश तो नहीं लगती, फिर भी यह समझना पर्याप्त है कि जब समाज के सर्वाधिक प्रभावी समर्थ नेताओं में अधिकांश भ्रष्ट हों, अधिकांश अधिकारी-उच्चाधिकारी भ्रष्ट हों तथा लगभग व्यापारिक और औद्योगिक घराने भ्रष्ट हों, उस समाज में 'धरती के भगवानÓ जैसे जुमलों से डॉक्टरों को प्रभावित करने की कोशिश व्यर्थ है। ऐसे सामाजिक हालातों में वे भी संवेदनहीन और भ्रष्ट क्यों नहीं हो सकते।
इसी तरह से प्रदेश में और आसपास के प्रदेशों के उन इलाकों में जहां प्रभावी क्षत्रिय आबादी है, वहां-वहां संजय लीला भंसाली की आने वाली फिल्म पद्मावती का विरोध हिंसक चेतावनियों के साथ हो रहा है।
चिंता यह नहीं है कि भंसाली की पद्मावती रिलीज हो पाती है कि नहीं; असल खतरा अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ती दबंगई से है। अभिव्यक्ति की आजादी की जब बात कर रहे हैं, तब विवेकसम्मत तरीके से कहने की आजादी की बात ही कर रहे होते हैं, किसी अनर्गलता की नहीं। यूं तो इतिहास पर विवाद खड़े किए जाते रहे हैं लेकिन ऐसे इतिहासकार, जिनकी दुनिया के अपने समकक्षों में प्रतिष्ठा है, उनके कहे को खारिज करते हैं तो अराजकता की हद तक जाकर किसी भी तथ्य को खारिज कर सकते हैं। ऐसी प्रवृत्ति समाज के उन समूहों में लगातार बढ़ती दीखने लगी है, जिन्हें सामान्यत: समर्थ, समृद्ध और दबंग माना जाता रहा है।
व्यक्ति की कल्पना से अनर्थ भी सृजित हो सकते हैं, जायसी ने नहीं सोचा होगा कि पद्मावती को लेकर जो काव्य उन्होंने रचा उसे इतिहास मान कर बखेड़ा खड़ा कर दिया जायेगा। के. आसिफ ने कभी मुगले आजम बनाई, इस असहिष्णु समय में उसे बनाना संभवत: संभव ही नहीं होता।
पद्मावती फिल्म अभी तक ना रिलीज हुई है, और ना इसकी अभी तक कोई स्क्रीनिंग हुई है, सेंसर बोर्ड ने भी अभी तक इसे पास नहीं किया है। चिन्ता की वजह यही है कि केवल सुनी-सुनाई बातों पर यकीन कर एक समर्थ और शिक्षित समूह इस पर विचार और विमर्श की बिना गुंजाइश रखे किस कदर उद्वेलित हुआ जा रहा है।
राजस्थान खासकर क्षत्रिय समाज का लोकप्रिय घूमर नृत्य पद्मावती के लिए फिल्माया गया है, उसकी वीडियो क्लिप फिल्म के प्रचारार्थ जारी वीडियो में से एक है, जिसे टीवी चैनलों में कई बार दिखाया जाने लगा है। बिना उसे गौर से देखे विरोध इसलिए हो रहा है कि उसमें रानी को बिना घूंघट के नचवा दिया। इस गीत को देखने से लगता है कि निर्देशक ने इसके फिल्मांकन में समाज की मर्यादाओं का पूरा खयाल रखा है। इस गाने में एकमात्र जिस पुरुष को दिखाया गया, वह पद्मावती के पति राजा रतनसेन ही हैं। कोई अन्य पुरुष इस गीत के दौरान किसी फ्रेम में दिखाई नहीं देता। जो समाज यदि इतनी छूट भी नहीं देता, उसे अपने भीतर झांकना शुरू कर देना चाहिए, अन्यथा तकनीक के चलते जिस गति से समाज के अन्तर्संबंधों में बदलाव आ रहे हैं उसमें वे ना केवल अप्रासंगिक हो जाएंगे बल्कि अपनी आगामी पीढिय़ों के लिए अलग तरह की कुंठाओं को भी बो रहे हैं।
इस फिल्म पर आए दूसरे जिस एतराज को खुद भंसाली ने सिरे से ही खारिज किया है, वह है अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के बीच किसी फैंटेसी-दृश्य का होना। फिर भी भंसाली एतराज करने वाले समाज के प्रतिनिधियों को फिल्म रिलीज करने से पूर्व दिखाने को तैयार हैं। समाज के संजीदा लोगों को आगे आना चाहिए। ये ज्यादा चिंताजनक है जब कुछ संजीदा सामाजिक लोग भी राजनीतिक नफे-नुकसान का आकलन कर या तो चुप रहते हैं या विरोध की रस्म अदायगी भी करने लगे हों।
अपनी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में फिल्मों में अनर्गलता नियन्त्रण के लिए सरकार की ओर से सेंसर बोर्ड भी बना हुआ है। यदि लगता है कि वह भी जिम्मेदारी से काम नहीं कर रहा है तो फिर अपने सामाजिक होने की पड़ताल के लिए भी आईना क्यों न देखेंहम खुद कितने जिम्मेदार हैं।
दीपचन्द सांखला

16 नवम्बर, 2017