Thursday, April 19, 2018

पुष्करणा स्टेडियम और नरसिंह भवन के बहाने जनता की भेड़ावस्था की बात


बीकानेर क्षेत्र के दिग्गज-दबंग राजनेता देवीसिंह भाटी ने 2003 का चुनाव अपनी जेबी पार्टी राजस्थान सामाजिक न्याय मंच से जीता। कोई राजनेता दिग्गज हो और साथ में दबंग भी तो वह भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी को भी ठेंगा दिखाने का दुस्साहस कर सकता है। अति महत्त्वाकांक्षी भाटी का दावं चुनाव जीतने के बावजूद उलटा पड़ा, विधानसभा में भाजपा को बहुमत मिला और वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री हो गईं। समय बीतते 2008 के चुनावों की चुनौती देख वसुंधरा भी अपने को असुरक्षित समझने लगीं, भाटी को मनाने की नौबत आ गई। आज तो वसुंधरा को भाटी की असल हैसियत का भान है, लेकिन तब शायद नहीं था। पार्टी में लौटने की भाटी ने अपनी अन्य शर्तों में जो एक शर्त रखी और पूरी करवाई वह यह कि प्रदेश के रियासती राजे-रजवाड़ों, ठाकर-ठिकानों की जमीनें सीलिंग से बाहर कर दी जाएं। वसुंधरा ने यह शर्त मानी और कानून पारित करवा उक्त किस्म की जमीनें सीलिंग से बाहर भी करवा दी। यह निर्णय विशुद्ध रूप से समूहविशेष के लाभ के लिए लिया घोर अनैतिक निर्णय था, तब राजस्थान पत्रिका ने तत्संबंधी बड़ी खबर लगाई और तथ्यों के साथ बताया कि इस बदलाव से किस तरह देवीसिंह भाटी को बड़ा लाभ हुआ है, सीमान्त क्षेत्र की हजारों बीघा भूमि भाटी के लिए अधिकृत हो गई। इस खबर को भाजपा में ही भाटी के प्रतिद्वंद्वी नरपतसिंह राजवी द्वारा उपलब्ध करवाने की चर्चा को भले ही दरकिनार कर दें, लेकिन याद नहीं पड़ता कि वसुंधरा राजे के उस घोर अनैतिक निर्णय के खिलाफ कोई छोटा-मोटा उद्वेलन भी प्रदेश में कहीं हुआ हो।
उक्त प्रकरण की याद अभी तब आई जब दैनिक भास्कर के स्थानीय संस्करण में बीकानेर नगर निगम की एम्पावर्ड कमेटी की बैठक की खबर पढ़ी। खबर का शीर्षक था 'पुष्करणा स्टेडियम के मुद्दे पर भड़के विधायक बोले : मुझे जलील करने के लिए निकाली फाइल।' मामला था निगम क्षेत्र के उन भवनों का जिनका नगरीय विकास कर (यूडी टैक्स) बकाया है। ऐसे भवनों को कुर्क करने का निर्णय लिया जाना था। पुष्करणा स्टेडियम का प्रकरण रखने और नरसिंह भवन के प्रकरण को कमेटी के सामने न रखने का मकसद भले ही उपायुक्त का अनुचित होबावजूद इसके मंझे-मंझाए राजनेता गोपाल जोशी ने जो कहा वह उन्हें नहीं कहना था। जिस पुष्करणा स्टेडियम की देखरेख गोपाल जोशी लम्बे समय से कर रहे हैं अलबत्ता उसका यूडी टैक्स बकाया होना ही नहीं चाहिए था, जबकि उस स्टेडियम का उपयोग व्यावसायिक हो रहा है। उन्हें लगता है कि वह सरकार के नियम-कायदों का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं तो स्टेडियम जैसी संपत्ति को सरकार के सुपुर्द कर देते। जोशी 1971 में भी और हाल ही की सरकार के हिस्सा रहे हैं। कम से कम उन्हें तो शासकीय गरिमा का खयाल रखना चाहिए था। अच्छा तो यह होता कि जिस नरसिंह भवन का जिक्र उन्हें अपने लक्षित प्रतिद्वंद्वी जनार्दन कल्ला के हवाले से किया, उस प्रकरण को भी कमेटी में रखवाते और पुष्करणा स्टेडियम और नरसिंह भवन दोनों के फैसले करवाते। और यदि उन्हें लगता है कि पुष्करणा स्टेडियम जैसा परिसर यूडी टैक्स से मुक्त होना चाहिए तो राज उनका है, क्यों नहीं तत्संबंधी आदेश निकलवा लाते। जब तक टैक्स वसूलने का कानून है आप इस बिना पर संबंधित विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से हड़का नहीं सकते कि वे पक्षपाती हैं या भ्रष्ट हैं। और जोशी कौनसा जानते नहीं है कि शहर के आम लोगों के आए दिन काम वाले दफ्तर नगर निगम और नगर विकास न्यास, दोनों ही महा बदनाम हैं। 84 पार के गोपाल जोशी से उम्मीद की जाती है कि ऐसे मौकों पर संजीदगी चाहे वे ना दिखा पायें, चतुराई से काम तो उन्हें लेना ही चाहिए।
रही बात जनता की तो आजादी के 70 वर्षों बाद भी वह भेड़चाल से नहीं निकल पा रही। इसके लिए वह कांग्रेस ही सर्वाधिक जिम्मेवार है जिसने देश पर सबसे ज्यादा शासन किया और अपनी अनुकूलता के लिए जनता को लोकतांत्रिक देश के बतौर नागरिक अशिक्षित बनाए रखा। गोपाल जोशी इस जिम्मेवारी से भी अपने को मुक्त इसलिए नहीं मान सकते कि उनके कुल राजनीतिक जीवन का अधिकांश हिस्सा एक कांग्रेसी के तौर पर ही बीता है। जनता जागरूक होती तो राजस्थान सरकार ने जब राजे-रजवाड़ों और ठाकर-ठिकानों के पक्ष में सीलिंग कानून में बदलाव किया तब कुछ बोलती। कांग्रेस भी इस ठकुरसुहाती से बरी नहीं है, 2008 में जब प्रदेश में अशोक गहलोत के नेतृत्व में पुन: सरकार बनी तब भी सीलिंग कानून के उस घोर अनैतिक बदलावों को उन्होंने न वापस लिया बल्कि चूं तक नहीं की।
कुल जमा बात यही है कि जब तक जनता अपने को भेड़ावस्था से बाहर नहीं ले आती तब तक इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का दुरुपयोग यूं ही होता रहेगा। जिन्हें जनता जिता कर शासन सौंपती है वे ही जनता को भूल कर ना केवल अपना हित साधने में लगे रहते हैं बल्कि वे अपने को, अपने परिजनों को और अपने जातीय समाज को लाभ पहुंचाने में ही लगे रहेंगे। जन प्रतिक्रिया के अभाव में लोक कल्याण की भावना इन राजनेताओं में कब की समाप्त हो चुकी है।
दीपचन्द सांखला
19 अप्रेल, 2018

Thursday, April 12, 2018

बीकानेर के राजनीतिक संदर्भों से जोशी, डूडी, कल्ला की बात


चुनावी वर्ष है, दिसम्बर में विधानसभा के और अगले वर्ष 2019 की मई में लोकसभा के चुनाव होने हैं। विधानसभा के संभावित उम्मीदवारों की ऐसी रेलम-पेल इससे पूर्व नहीं देखी गई। बीकानेर पूर्व क्षेत्र की विधायक जहां अपवाद हैं वहीं पश्चिम के विधायक गोपाल जोशी अपनी 84 से ऊपर की वय में भी उम्मीदों को हरा रखे हुए हैं, जबकि यही गोपाल जोशी 2013 का चुनाव जीतने के बाद बहुत संतोष से कहने लगे थे कि मुझे तो अब कोई चुनाव लडऩा नहीं है। तब उम्मीद बनी थी कि उत्तरवय के उनके राजनीतिकांक्षी मझले पुत्र गोकुल जोशी दावेदारी करेंगे। ऐसा कुछ होता उससे पहले ही पौत्र विजयमोहन जोशी की राजाकांक्षाएं हिलोरे मारने लगी। लेकिन थोड़ा समय क्या गुजरा, गोपाल जोशी महाभारत के ययाति की मानिंद अपना राजाकांक्षी यौवन लौटा लाए?
कहने को तो हाइकमान के निर्देश हैं, लेकिन गोपाल जोशी अपने विधानसभा क्षेत्र के वार्ड-वार्ड घूम रहे हैं। जोशी अपने शहर को कुछ देने की सचमुच मंशा रखते तो कोटगेट क्षेत्र की यातायात समस्या के समाधान को सिरे चढ़ाते। लेकिन जो राज भोगने की मंशा से राजनीति में आते हैं, उनसे ऐसी उम्मीदें कर खुद को निराश करना होता है। जोशी दर-दर इसलिए घूम रहे हैं ताकि पार्टी उन्हें एक अवसर और दे, कल्ला फिर सामने हों ताकि रिश्ते में साले कल्ला बंधुओं से हिसाब पूरा चुकत कर लें। अब तक पांच चुनाव जीते कल्ला को आमने-सामने का तीसरा चुनाव हराने की मंशा जोशी शायद इसीलिए पाले हैं। तुलसीदास की कही—'हानि लाभ-जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ' में थोड़ा परिवर्तन कर यूं कहें तो?—'जय-पराजय विश हाथ' (विश का मानी जनता से है)। इसलिए हो सकता है इस बदले माहौल में जीजा अपने सालों से पटखनी खा जाये।
खैर। जब बात कल्ला-बंधुओं पर आ ही ली है तो उन्हें भी निराश क्यों किया जाए, उनकी बात भी कर लेते हैं। पांच बार विधायक, पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके
डॉ. बीडी कल्ला भी इन दिनों परिवर्तन यात्रा के नाम पर अपने क्षेत्र के वार्डों में विचरण कर रहे हैं। यहां अपने उस आकलन को फिर दोहराने में कोई संकोच नहीं है कि बीकानेर से कांग्रेस के दोनों बड़े नेताओंडॉ. बीडी कल्ला और रामेश्वर डूडी को जो राजनीतिक हैसियत विभिन्न अनुकूलताओं से हासिल है, वह उनकी पात्रता से अधिक है, जरूरत पर कभी विस्तार से भी लिखूंगा। आज बड़ी हैसियत के इन नेताओं की आत्मविश्वासहीनता का जिक्र कर लेते हैं।
संक्षिप्त में कुछ बानगियांकांग्रेस के इसी 9 अप्रेल के जयपुर के राज्यस्तरीय सांकेतिक उपवास में सीपी जोशी समेत कुछ नेता केन्द्र से भी आए, लेकिन प्रदेश के बड़े नेताओं में शुमार तो सचिन पायलट और रामेश्वर डूडी दो ही थे, उपवास के जो फोटो जारी हुए उसमें पायलट अग्रिम पंक्ति में केन्द्रीय नेताओं के साथ बैठे हैं, लेकिन डूडी की मुंडी कहीं पीछे से झांक रही है। मतलब, नेता प्रतिपक्ष बनने के चार वर्ष बाद भी डूडी पार्टी में अपनी ऐसी हैसियत हासिल नहीं कर पाये कि पार्टी नेता उन्हें अग्रिम पंक्ति में तवज्जो देते। यही बात ना केवल बीकानेर क्षेत्र में डूडी की है, बल्कि खुद के कस्बे नोखा में भी उन्हें अपनी हैसियत जताने को बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ती है। आत्मविश्वासहीनता का ही नतीजा है कि बीकानेर पार्टी संगठन में अग्रिम पंक्ति के किसी नेता से उनके भरोसे के संबंध नहीं हैं।
बीडी कल्ला का मिजाज भी डूडी सा ही है। अभी चल हरी परिवर्तन यात्रा की बात करें तो जहां कल्ला राजकुमार किराड़ू के साथ अपने को असहज पाते हैं वहीं प्रदेश सरकार की अकर्मण्यता जाहिर करने के बजाय वे डॉ. तनवीर मालावत के साथ कहा-सुनी तक मुखर हो लिए। इस सार्वजनिक बदमजगी के दूसरे दिन डॉ. तनवीर के साथ वैसी ही अधीरता जनार्दन कल्ला ने भी दिखाई। तय है, इस परिवर्तन यात्रा का मकसद बीकानेर पश्चिम से कांग्रेस उम्मीदवार को स्थापित करना तो नहीं है। बावजूद इस यात्रा में 'हमारा विधायक कैसा हो बीडी कल्ला जैसा हो' जैसे नारे लगाए गए, यहां तक की डॉ. तनवीर के भाषण के दौरान भी डॉ. कल्ला के समर्थक चुप नहीं रह सके, बदमजगी की शुरुआत यहीं से हुई।
पार्टी की प्रदेश इकाई में कल्ला को वैसी हैसियत हासिल है जिसमें तय नियम कायदों के बावजूद उनकी उम्मीदवारी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। राजकुमार किराड़ू और डॉ. तनवीर मालावत कभी कल्ला गुट के ही माने जाते थे। अब स्थिति यह है कि उन्हीं के सामने किराड़ू उम्मीदवारी के लिए बराबरी का हक ठोके हुए हैं वहीं इस घटना के बाद डॉ. तनवीर के तौर पर दूसरी चुनौती उन्होंने स्वयं खड़ी कर ली। इन्हीं दो नेताओं की बात क्योंबीते चालीस वर्षों की कल्ला बंधुओं की राजनीतिक सक्रियता में उनके परिजनों के अलावा क्या कोई एक भी नेता या कार्यकर्ता ऐसा है जिसे कल्ला बंधु लम्बे समय तक परोट पाए हों? जब व्यक्ति को खुद पर भरोसा नहीं होता तो वह किसी अपने पर भी यकीन नहीं कर पाता, कल्ला बंधु इसी मानसिकता के शिकार हैं।
यहां सोमचन्द सिंघवी के साथ हुए एक मामले का उल्लेख भी कर सकते हैं। मार्च 2002 में वे नगर विकास न्यास के अध्यक्ष मनोनीत हुए, बिना कल्ला बंधुओं की कृपा के, इसे कल्ला बन्धु पचा नहीं पा रहे थे। एक दिन आमने-सामने होते ही जनार्दन कल्ला फट पड़े। सिंघवी की नियुक्ति के लगभग एक महीने बाद ही बीकानेर के जिला कलक्टर निर्मल वाधवानी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई, उनके शोक का कार्यक्रम था। अग्रज कल्ला मौके की नजाकत का भी लिहाज नहीं रख पाए, उनका धैर्य चुक गया। कलक्टर कोठी से बाहर निकलते ना निकलते ही सोमचन्द सिंघवी से यूं उलझ पड़े जैसे वे इनकी गाय खोल के ले आए हों। डॉ. कल्ला की आत्मविश्वासहीनता के अन्य कई उदाहरण पूर्व में जब-तब इसी कालम में पाठकों के साथ साझा किए हैं। कल्ला बंधुओं को अब भी धैर्य धारण कर लेना चाहिए, अन्यथा हश्र देवीसिंह भाटी वाला होते देर नहीं लगती, चुनाव ना लडऩे का भी कोई बहाना ढूंढऩा पड़ सकता है।
कल्ला बंधु संजीदगी नहीं रखेंगे तो वे ये भूल रहे हैं कि परिसीमन के बाद उनके क्षेत्र की तासीर बदल गई है, मुस्लिम समुदाय के बाद माली समुदाय से कोई दावेदार इस सीट पर उन्हें चुनौती देने आ धमका तो? ऐसे में प्रदेश स्तरीय नेता कल्ला क्या अपने को उस हैसियत में पाते हैं कि राजस्थान की दो-चार में से किसी भी सीट से ताल ठोक सकें?
दीपचन्द सांखला
12 अप्रेल, 2018

Thursday, April 5, 2018

दलितों के भारत बन्द के बहाने अपने शहरियों से कुछ


एससी/एसटी से संबंधित कानून पर आए उच्चतम न्यायालय के ताजे फैसले से नाराज दलित समुदाय के 2 अप्रेल 2018 के भारत बन्द पर बात करने से पूर्व यह बता देना जरूरी है कि यह आलेख किसी भी प्रकार की हिंसा की ना तो पैरवी है और ना ही तरफदारी।
आगे बात करने के पूर्व बीकानेर के संदर्भ में पिछली सदी के सातवें दशक के उत्तराद्र्ध से बन्द और हड़तालों की कुछ बानगियों से रू-बरू हो लेते हैं। समाजवादी नेता मुरलीधर व्यास व्यवस्था के खिलाफ बीकानेर में मुख्य स्वर रहे। उनके बुलाए बन्द पर शहर सहानुभूतिपूर्वक सहयोग करता रहा है। आठवें दशक की शुरुआत में उनके निधन के बाद 1972-73 में संभाग की उल्लेखनीय हड़ताल विश्वविद्यालय की मांग को लेकर हुई। इस हड़ताल के दौरान ना केवल एकाधिक बंद हुए बल्कि उग्र और हिंसक प्रदर्शन भी कई बार हुए। 1974 में रेलवे की देशव्यापी हड़ताल के दौरान हुए भारत बन्द के दिन जबरदस्त उग्रता के बीच सार्वजनिक संपत्ति का काफी नुकसान हुआ था।
1975 में लगे आपातकाल और 1977 में जनता पार्टी की सरकार के बाद 1980 तक उग्र हड़तालों का दौर लगभग थम गया। जो इनमें संलग्न थे वे राज में आ लिए और विपक्ष में आई कांग्रेस एक तो स्तब्ध थी, दूसरे हड़तालों के अनुकूल अपने को सहज पा ही नहीं रही थी। इन्दिरा गांधी की गिरफ्तारी हुई तो कांग्रेसी इतना ही चेतन हो पाए कि गिरफ्तारियां देकर कुछ दिनों के लिए जेलों के वासी हो लिए।
1980 में लौटे कांग्रेस राज के बाद हड़तालों का दौर फिर से शुरू हुआ। इन अवसरों पर तब के कांग्रेस के दो व्यापारी नेताओं ने बन्द में शामिल ना होने का तय किया। पहले तब के पूर्व विधायक और कांग्रेस नेता गोपाल जोशी व दूसरे तत्कालीन शहर युवक कांग्रेस अध्यक्ष विजय कपूर, वे बाद में सभापति बने, जो अब रहे भी नहीं हैं। गोपाल जोशी की स्टेशन रोड पर छोटू-मोटू जोशी नाम से तो विजय कपूर की महात्मा गांधी रोड पर कपूर ब्रदर्श नाम से दुकानें हैं। पिछली सदी के नवें दशक के सभी बन्दों में इन दोनों नेताओं की अपनी जिदें चली भी, इसका बड़ा कारण तो यही था तब की कोई हड़ताल और बन्द उग्र-हिंसक नहीं थे।
उसी दौरान के एक भारत बन्द का, जिसमें बैंक कर्मचारी भी शामिल थे, किस्सा बयां कर देते हैं। स्टेशन से निकले विशाल जुलूस को देखते खुली छोटू-मोटू जोशी की दुकान के आगे पुलिस का पूरा जाब्ता था। हड़ताली दुकान के आगे कई देर तक रोष जाहिर कर आगे बढ़ लिए। जोशी के परिजन दुकान पर खड़े मुसकराते रहे। लेकिन कपूर ब्रदर्श के यहां उतना जाब्ता नहीं था। जुलूस महात्मा गांधी रोड पहुंचा तो लगा हड़ताली छोटू-मोटू जोशी दुकान की अपनी खीज क्रॉकरी और ग्लासवेयर से भरे कपूर ब्रदर्श पर निकालेंगे। विजय कपूर स्वयं काउण्टर पर शान्त बैठे रहे। पूरा जुलूस कपूर ब्रदर्श पर सिमटता जा रहा था। लगने लगा कि कुछ भी हो सकता है। इतने में बैंक कर्मचारी नेता 'कॉमरेड' योगी दुकान और हड़तालियों के बीच आ गये। 'चोर कपूरिया मुर्दाबाद-मुर्दाबाद, कपूरिया तेरी ऐसी-तैसी' जैसे जोरदार नारों के बीच योगी ने चतुराई से कब आन्दोलनकारियों को कचहरी की ओर प्रस्थान करवा दिया, हड़तालियों को पता ही नहीं लगने दिया। इसकी चर्चा शहर में कई दिनों तक रही, लोग यह कहने से भी नहीं चूकेदेखो, योगी ने कपूर के साथ शाम को बैठने का वास्ता किस चतुराई से निभाया। वैसे योगी को ये वामपंथी अपनी शब्दावली में 'कॉमरेड' क्यों संबोधित करते हैं, इसका जवाब वहीं देंगे।
इसके बाद भी कई हड़तालें हुई और डंडे के जोर पर बन्द भी सफल होते रहे हैं। लेकिन वे सभी उच्च या पिछड़ी जातिवर्गीय दबंगों के नेतृत्व में हुएहिंसा हुई और तोड़-फोड़ भी। 2003 में ऐसे ही राजस्थान बन्द का खमियाजा बीकानेर के कई दुकानदारों ने भुगता है। पद्मावत को लेकर भी हाल का मुकम्मल बन्द एक उदाहरण है। हाल की हड़ताल पर शहर को नजर लगने का स्यापा जो कर रहे हैं उक्त जानकारियां उन्हीं के लिए हैं। हो सकता है ऐसों के उस उच्चकुलीय दम्भ को धक्का इसलिए लगा हो कि ये 'नीचÓ भी डांग दिखाने लगे हैं।
अपने दो ट्वीट को यहां दोहरा कर कुछ और बातें भी लगे हाथ कर लेते हैं। 2 अप्रेल का ही ट्वीट है कि 'यह हिंसा की तरफदारी नहीं है लेकिन मन मार कर ही सहीदबंग समूहों द्वारा बुलाए बन्द के आह्वान को जब-तब सहते ही रहे हो, इसे भी सह लेते। खिलाफत नहीं करते तो हो सकता है यह बंद भी शान्तिपूर्वक निपट जाता। कमजोर के पास खोने को कुछ खास नहीं होता, वह अपनी जान की कीमत भी बहुत कम आंकता है।'
बन्द से एक दिन पूर्व 1 अप्रेल की शाम का ट्वीट भी आप पढ़ लें। 'बीते 70 वर्षों में दलितों ने पहली बार भारत बंद का आह्वान किया है। प्रतिक्रिया में बीकानेर के जिन 16-17 संगठनों ने बंद को असफल बनाने का आह्वान किया उनमें पिछड़े वर्ग के एक को छोड़ सभी या तो उच्च जातिवर्गीय संगठन हैं या उच्च जातिवर्गीय प्रभावी। कुछ प्रश्न : अब तक हुए ऐसे सभी बंदों से क्या सभी सहमत थे या अन्य कारणों से उनमें शामिल होते रहे हैं। उच्चतम न्यायालय के सम्मान के नाम पर पहले भी ऐसी प्रतिक्रिया हुई है, पद्मावत फिल्म का ताजा उदाहरण याद कर लें। बंद यदि असफल होता है तो न्यायालय के ताजा फैसले पर दलितों की सभी तरह की आशंकाएं सही साबित होंगी।'
लेकिन लगता है दलित इस बार अपने होने को साबित करना तय कर चुके थे। इसका ही नतीजा था कि अपने बन्द को सफल करवाने के लिए वे हिंसक हुए। हम यह संतोष करें कि शहर में हुए पिछले बन्द सफल जिस तरह होते रहे हैं, दलित उनसे अनभिज्ञ थे, तो यह हमारी मासूमियत है। दलितों ने वही तरीका अपनाया जो उनसे पहले के बन्द के आयोजक समूह अपनाते आए हैं।
इस बंद का विरोध करने वालों ने इसे आरक्षण व्यवस्था के विरोध का अवसर समझा, वहीं कहा यह भी गया कि न्यायालय ने यही तो कहा कि एससी/एसटी कानून के तहत बिना जांच गिरफ्तारी ना हो और आरोपी को अग्रिम जमानत की व्यवस्था दी। लेकिन जो सबसे गंभीर चोट इस फैसले से एसटी/एससी कानून को लगी है उस का जिक्र उच्चवर्गीय प्रभावी मीडिया भी नहीं कर रहा, जिसे 2 अप्रेल के रवीशकुमार के प्राइम टाइम में विधिवेत्ता फैरजान मुस्तफा ने कुछ यूं बताया-स्त्री प्रताडऩा पर बिना जांच एफआइआर दर्ज ना करने की व्यवस्था उच्चतम न्यायालय की जिस पीठ ने कुछ माह पहले दी, उसी पीठ ने एससी/एसटी प्रताडऩा पर बिना जांच के एफआइआर दर्ज ना करने की व्यवस्था दी है। जबकि अन्य सभी प्रताडऩाओं पर सीधे एफआइआर करवाई जा सकती है।
उच्चतम न्यायालय की नई व्यवस्था के सीधे-सीधे मानी यही हैं कि प्रताडऩा के मामले में एफआइआर का वह सामान्य हक भी छीन लिया है जो सभी को हासिल है। दलितों का नेतृत्व चूंकि पुरुषों के हाथ में है। अत: स्त्रियों की तरह वे चुप नहीं रहे। अब स्त्रियों को प्रेरित कौन करे कि प्रताडऩा पर उच्चतम न्यायालय ने सीधे एफआइआर तक का हक आपसे भी छीन लिया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि समाज में चौथी-पांचवीं हैसियत वाले दलित भी अपनी स्त्री को पुरुष से एक दर्जा नीचे ही मानते हैं।
एससी/एसटी से संबंधित झूठे मुकदमे दर्ज होने की बात भी की जाती रही है। इस तरह की बातों के मानी इसलिए नहीं है कि दहेज सहित अनेक धाराओं के लिए भी यही कहा जाता है। ऐसी प्रवृतियों में सुधार कानून बदलने से नहीं होगा बल्कि जरूरत है जांच के तौर-तरीकों को निष्पक्ष और दुरुस्त करने की।
लगे हाथ कुछ यह भी...
यह तो हो ली बन्द के संबंध से बात। अब बीकानेर के वकीलों के संदर्भ से भी एक बात कर लेते हैं। बीकानेर का यह वही बार है जो बहुसंख्यकीय उच्चकुलीन मंशाओं का वाहक है। पिछले वर्ष जून में भारत-पाकिस्तान का मैच था, पाकिस्तान जीत गया। मूर्खता कहें या नादानी, भुट्टा बास के एक नाबालिग सहित छह मुसलिम युवाओं ने पास के सुभाषपुरा मुहल्ले में पहुंचकर पटाखों के साथ खुशी का इजहार कर दिया, शहर भर में हंगामा हो गया। एफआइआर दर्ज हुई और राजद्रोह में उन्हें अन्दर कर दिया गया। पाकिस्तान जिन्दाबाद के उन्होंने नारे लगाए इस पर भी दो मत हैं। कहा यही जाता है कि यह नारा लगा ही नहीं, एफआइआर को मजबूत बनाने के लिए जोड़ा गया। खैर, समाज में व्याप्त अनेक तरह की असमानताओं से उपजी कुण्ठाओं में कुछ युवकों ने गलती कर भी दी तो इतना बड़ा अपराध उन्होंने क्या कर दिया कि शहर के वकीलों ने न केवल उनकी पैरवी नहीं करने का निर्णय कर लिया बल्कि कोई तैयार भी हुआ तो वकीलों ने कोर्ट के गेट पर खड़े होकर उन्हें न्यायालय में घुसने तक नहीं दिया। इतना ही नहीं, घटना के आठ दिन बाद ही ईदुलफितर था, मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार। युवक जेल में और उनके परिजनों का त्योहार हराम। एक महीने से ज्यादा समय बाद तक उन युवकों की जमानत नहीं हो पायी। अब तक सुनते तो यही रहे हैं कि बीकानेर के वकीलों में कई बुजुर्ग संजीदा और समझदार हैं लेकिन ऐसे समय में ये मौन हो लिए। भारत की न्याय व्यवस्था ने विदेशी आतंकवादियों को भी कानूनी सहायता का अधिकार दे रखा है। वे युवक तो अपने देश की ही थे, जो उस मुकदमे में आज भी आरोपी है। इस तरह का व्यवहार उन्हें स्थायी अपराधी नहीं बनाएगा, इस बात की क्या गारन्टी है?
वहीं, इसके बरअक्स पिछले तीन-चार वर्षों से रामनवमी के उत्सव पर जो-जो नारे लगते हैं वह क्या राजद्रोह नहीं है? संविधान की सीधी अवमानना नहीं है? इस पर कभी यहां के किसी वकील का संविधान प्रेम या राष्ट्रभक्ति जागती नहीं देखी गयी।
बन्द के ऐसे आह्वानों पर वकील अक्सर अदालती कामकाज स्थगित रखते हैं। 2 अप्रेल को उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें बदमजगी का सामना करना पड़ा। यह लोकतंत्र है, या तो इसे समाप्त कर लें, नहीं तो हर क्षेत्र में असमानता से उपजी कुण्ठाओं का इजहार यूं ही होता रहेगा और अराजकता को बढऩे से राज भी नहीं रोक पाएगा।
दीपचन्द सांखला
5 अप्रेल, 2018

Thursday, March 29, 2018

'भथूळियों' की आड़ में कुछ यूं ही


राजस्थान की राजनीति के भथूलिये पिछले सप्ताह बीकानेर से गुजरे। जिनकी तीव्रता इतनी कम भी नहीं थी कि असर ना दिखाए। एक ओर बीते चार वर्षों में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी को इस क्षेत्र की जनता ने पहली बार सक्रिय देखा तो कुछ स्थानीय चुहलबाज ये कहने से भी नहीं चूके कि 'जांवती री बाजा' है। वहीं दूसरी ओर ऐसी सक्रियता यहां की जनता ने सचिन पायलेट की भी पहली बार देखी लेकिन परनामी से ठीक उलट। लगता है पायलेट की अध्यक्षी स्टेपनी भाव से बाहर आने को कसमसाने लगी है।
वैसे कांग्रेस के अधिकांश क्षेत्रीय नेताओं की हैसियत कभी कठपुतली से ज्यादा की नहीं रही लेकिन शाह-मोदी के बाद भाजपा भी उसी गत को हासिल हो गई है। हालांकि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे चार वर्षों से अपनी हैसियत को बनाए रखने की पूरी जद्दोजहद में हैं लेकिन लगता है हाल के उपचुनावों के परिणामों ने उन्हें काफी कमजोर किया है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि राजे ने घुटने टेक दिए हों। सौदेबाजी चल रही है, लेकिन चतुर शाह राजे के आमने-सामने नहीं हो रहे। शाह को लगता है मिलने का समय ना देकर राजे को हताश कर देंगे।
राजस्थान विधानसभा चुनाव के ऊंट की करवट का तो नहीं पता लेकिन लगता यही है कि वसुंधरा अपना यह कार्यकाल पूरा करेंगी। पार्टी के पास भी वसुंधरा के जोड़ का विकल्प नहीं है। चुनाव सामने नहीं होते तो अमित शाह किसी राजस्थानी खट्टर या दास को थरपकर राज चला लेते। ऐसे में बलि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की ही होनी है।
यह आम चलन हो गया है कि प्रदेश पार्टी की कमान मजबूत मुख्यमंत्री अपने किसी 'सरकिट' को ही देते हैं, भरोसेहीनता के इस राजनीतिकाल में यह जरूरी हो गया है। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर महज सरकिट की भूमिका निभा रहे अशोक परनामी का हश्र वही होगा जो जरूरत पडऩे पर मुन्नाभाई के सरकिटों का होता है। कहा जा रहा है कि परनामी डेमेज कन्ट्रोल की अपनी आखिरी कवायद के तहत ही बीकानेर भाजपा को सम्हालने आये थे। यहां की दोनों इकाइयों में असंतोष लम्बे समय से था, ऐसे असंतोष लाइलाज होते हैं। पता होता है पात्र ही बदल सकते हैं, असंतोष खत्म नहीं कर सकते, सो जैसा है वैसा ही चलने दिया जाता है। परनामी आए तो तीन दिन के लिए थे, बीच में अचानक जिस तरह गए उससे लगा कि विदा की घड़ी आ ली, लेकिन फिलहाल वे लौट आए। स्थानीय असंतोष की स्थितियां ऐसी हैं कि परनामी यदि न आए होते तो गुबार फट पड़ते। परनामी लौटे तो लग रहा है एक बारगी सब 'रिलीज' हो लिये हैं। लगभग तय है कि नया प्रदेश अध्यक्ष जो भी बनेगा वह मुख्यमंत्री का सरकिट नहीं होगा, अमित शाह का सरकिट होगा। इस नवनियुक्ति के साथ ही भाजपा की प्रदेश इकाई 'चुनावी मोड' में आ लेगी। ऐसे में स्थानीय इकाइयों के असन्तोष एकबारगी तो फुस्स हो ही जाने हैं।
वहीं कांग्रेसियों के सामने सत्ता टिमटिमाने लगी है। कांग्रेस को इस वहम में नहीं होना चाहिए कि यह चुनावी अनुकूलता उनके द्वारा अर्जित है, राज की प्रतिकूलता (एंटी इंकम्बेंसी) और तीसरे विकल्प के अभाव में मजबूरी का विकल्प कांग्रेस है। प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलेट, जो हाल ही तक स्टेपनी मोड में थे, उससे बाहर आते दिखने लगे हैं। हालांकि उनकी इस बीकानेर यात्रा को अध्यक्षी की वैसी सक्रियता की बानगी नहीं मान सकते। सामान्य शिष्टाचार के तहत उन्हें रामेश्वर डूडी के चाचा के शोक में एक बार आना था सो रास्ते में पिछले दिनों ही दिवंगत कांग्रेस के खांटी नेता भोमराज आर्य के परिजनों से भी मिलते आए और यहां भानी भाई के परिजनों से भी मिल गए।
प्रदेश के चुनावों में अब सात माह भी शेष नहीं हैं। भाजपाई दिग्गज और क्षत्रप सांप-नेवले की लड़ाई में व्यस्त हैं वहीं माहोल की अनुकूलता के बावजूद कांग्रेस संसाधनों के अभावों में ठिठकी हुई है।
कांग्रेस में अशोक गहलोत को जब से राहुल गांधी के राजनीतिक अभिभावक की भूमिका में देखा जाने लगा तब से ही लग रहा है कि उन्हें राजस्थान में अब नहीं रहने दिया जायेगा। ऐसे में सचिन पायलेट ही बचते हैं। अन्य कोई नेता या तो अपनी पात्रता वैसी जता नहीं पाये या पात्रता वे रखते ही नहीं हैं। मुख्यमंत्री का चेहरा कोई पार्टी आगे करती दिख इसलिए नहीं रही की दिखाने लायक चेहरा जिनका है उन्हें  अभिभावक की नैष्ठिक भूमिका में जाना पड़ रहा है। वैसे यह आम चलन है कि जब राज नहीं होता तब कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं में असंतोष नहीं होता। हां, चूंकि चुनाव सामने हैं और स्थितियां कांग्रेस के अनुकूल दिख रही हैं, ऐसे में सचिन पायलेट को स्थानीय नेताओं की केवल आकांक्षाओं का ही सामना करना पड़ा। हर नेता टिकट का आकांक्षी होता है, कुछ मुखर हो लेते हैं तो कुछ हो नहीं पाते।
बीकानेर के संदर्भ में बात करें तो कांग्रेस के यहां प्रदेश स्तरीय दो नेता हैं, नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ. बीडी कल्ला। कहने को दोनों ही वैसे नेता हैं जिन्हें विभिन्न अनुकूलताओं के चलते अब तक पात्रता से अधिक ही हासिल होता रहा है। डूडी फिलहाल पारिवारिक शोक में थे इसलिए उनकी भाव भंगिमाओं का जिक्र अभी ठीक नहीं। लेकिन डॉ. कल्ला अपने से बड़े कद वाले के सामने अपनी राजनीतिक हैसियत के मुखौटे को सहेज कर सामान्यत: नहीं रख पाते, सचिन पायलेट की इस बीकानेर यात्रा के दौरान भी नहीं रख पाए। राहुल की उस घोषित नीति के बाद कि लगातार दो बार हारे को पार्टी उम्मीदवार नहीं बनाएगी, डॉ. कल्ला कुछ ज्यादा ही आशंकित नजर आने लगे हैं। 38 वर्ष के अपने राजनीतिक जीवन में कल्ला को वह मुकाम हासिल है जिसमें उनकी उम्मीदवारी की दावेदारी को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। अत: उन्हें पात्रता से बड़ी अपनी हैसियत की हीनता से बाहर आकर हासिल हैसियत को भुनाना चाहिए। पार्टियां कैसे भी नियम कायदे बना लेव्यावहारिक राजनीति करने हेतु उसे बळ पड़ते जाली-झरोखे रखने पड़ते हैं।
दीपचन्द सांखला
29 मार्च, 2018

Thursday, March 22, 2018

कन्हैयाकुमार के जयपुर आयोजन के बहाने अभिव्यक्ति-स्वतंत्रता की बात


सत्ता की खुमारी और दम्भ तो वैसे गांधीवादियों में भी देखा गया है लेकिन राजस्थान भाजपा के संदर्भ से बात करें तो अलोकतांत्रिक संस्कारों से पोषित दक्षिणपंथी पार्टी होते हुए भी यहां भैरोसिंह शेखावत के होते लोकतांत्रिक मूल्यों में कुछ भरोसा रखने वालों का पार्टी में बोलबाला रहा है। केन्द्रीय स्तर पर बात करें तो ऐसे ही अटलबिहारी वाजपेयी रहे, जिनके मुखौटे के चलते ही सही, पार्टी का चेहरा कुछ हद तक लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष बना रहा।
भाजपा नेताओं में भैरोसिंह शेखावत की छवि ना केवल धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक की रही बल्कि उच्च जाति वर्ग से होते हुए भी जातीय दंभ से लगभग मुक्त व्यवहार करते हुए भी उन्हें देखा गया। हाल ही के पद्मावती विवाद के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो शेखावत के राज में रूपकंवर के सती होने का मामला उल्लेखनीय उदाहरण है, उन्होंने तब स्वजातीय दबंगों की बिल्कुल परवाह नहीं की। वहीं वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का मिजाज सामन्ती होते हुए भी साम्प्रदायिक ना होने की अपनी साख उन्होंने हाल तक बचाए रखी है। वसुंधरा के राज में लोकतांत्रिक मूल्यों का मान भी कुछ तो रखा ही जाता है, इसे गुजरात के मोदी राज से तुलना कर बेहतर समझ सकते हैं। लेकिन शाह-मोदी जैसे धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों में भरोसा बिल्कुल ना रखने वालों के पार्टी पर हावी होने के बाद की छाया राजस्थान में देखी जाने लगी है। इसे हाल ही की एक घटना से बयां कर सकते हैं।
देश में चर्चित छात्र नेता कन्हैयाकुमार का एक व्याख्यान 11 मार्च 2018 रविवार को जयपुर में आयोजित होना था। राजस्थान जनलोक मोर्चा के बैनर तले 'जन-मंथन' नाम से आयोज्य इस कार्यक्रम की स्वीकृति पुलिस-प्रशासन से पूर्व में ले ली गई थी। लेकिन आयोजन के दिन स्थानीय प्रशासन ने उसे उसी रूप में नहीं होने दिया।
यहां यह बताना जरूरी है कि जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैयाकुमार को इसलिए आरोपित और बदनाम किया गया कि जेएनयू के एक कार्यक्रम में उन्होंने भारत के टुकड़े होने जैसे नारे लगाए थे। लेकिन दिल्ली पुलिस ने जिस आरोप में कन्हैयाकुमार को जेल भिजवाया था, उसे वह न्यायालय में सिद्ध करना तो दूर, बल्कि जांच के बाद उसी पुलिस को न्यायालय में कहना पड़ा कि आरोपित अपराध में कन्हैयाकुमार की कैसी भी लिप्तता नहीं थी। जिन पांच नकाबपोशों ने बाहर से आकर जेएनयू के उस कार्यक्रम में राष्ट्रद्रोह के नारे लगाये थे, उनकी पहचान दिल्ली पुलिस अभी तक नहीं कर पायी है। इससे उस शक की पुष्टि होती है कि कन्हैयाकुमार और उस कार्यक्रम के आयोजकों को बदनाम करने के लिए विरोधी विचारधारा वालों की वह करतूत स्क्रिप्टेड थी। इस तरह की 'इल पॉलिटिकल प्रैक्टिसÓ के शिकार बहुधा भले लोग ही होते हैं।
यह सब बताना इसलिए जरूरी है कि जैसे ही राजस्थान के शासन पर प्रभावी भाजपाइयों के उन अलोकतांत्रिक नेताओं को यह जानकारी हुई कि 11 मार्च के इस आयोजन में कन्हैयाकुमार का भाषण होना है, वे सक्रिय हो लिए। ना केवल कार्यक्रम की स्वीकृति रद्द करवा दी गई बल्कि कार्यक्रम होने से एक दिन पूर्व पुलिस ने आयोजक युवा एक्टिविस्ट हरिदान चारण को बुलाकर हवालात में भी बन्द कर दिया। ऐसे हालात आपातकाल के अलावा तो उन इन्दिरा गांधी के शासन में भी कभी देखे नहीं गये जिन्हें यही भाजपाई अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर सर्वाधिक भुंडाते हैं। इस घटना की जानकारी जैसे-तैसे हरिदान के शुभचिन्तकों को हो गई और वे भी सक्रिय  हो लिए। यहां यह बताना भी जरूरी है कि भाजपा में अब भी कुछ युवा नेता ऐसे हैं जिनका ना केवल सोच और व्यवहार धर्मनिरपेक्ष है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों में भी उनकी निष्ठा है। ऐसे भाजपाइयों को ना केवल पुलिस-प्रशासन से भिडऩा पड़ा बल्कि अपने नेताओं से भी संवाद करना पड़ा। इस कवायद के बाद हरिदान को तो छोड़ दिया लेकिन कार्यक्रम रद्द करने के आदेश को वापस फिर भी नहीं लिया। स्वीकृति को बहाल फिर भी नहीं किया गया। प्रशासन से बड़ी जद्दोजेहद के बाद तय समय पर जयपुर के ही कुमारानन्द भवन में सीमित कार्यक्रम कर आयोजकों को सन्तोष करना पड़ा।
कन्हैयाकुमार पर लगाए आरोपों को जब दिल्ली पुलिस खुद वापस ले चुकी है, जयपुर में उनके आयोजन से सत्ता का भयभीत होना वर्तमान सरकार के चरित्र को संदिग्ध बनाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अधिकार की यह अवहेलना संवैधानिक भावना के खिलाफ है। इस तरह की कार्यवाहियों से लगता है कि शासन में उन लोगों का दबदबा बढ़ रहा है जिनका विश्वास ना लोकतांत्रिक मूल्यों में है और ना ही धर्मनिरपेक्षता में। ऐसे में, यह जरूरी हो जाता है कि ना केवल हरिदान जैसे एक्टिविस्टों की हौसला अफजाई हो बल्कि भाजपा में ऐसे नेताओं की ताकत भी बढ़े जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूल्यों और वैचारिक-धार्मिक सहिष्णुता में भरोसा रखते हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की श्वसन क्रिया और वैचारिक-धार्मिक सहिष्णुता उसकी प्राणवायु है।
दीपचन्द सांखला
22 मार्च, 2018

Thursday, March 15, 2018

कटारिया कुटाई का वीडियो तथा उसके तीर और तुक्के


पिछले सप्ताह सोशल साइट्स पर 2003 में फिल्माया एक वीडियो वायरल हुआ। सनसनी और मारकाट से भरपूर लगभग साढ़े पांच मिनट के इस वीडियो के ना केवल स्क्रिप्ट राइटर बीकानेर के हैं बल्कि मुख्य किरदार भी बीकानेर से ही हैं। राजस्थान सरकार के वर्तमान गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया तो मेहमान कलाकार के तौर पर धक्के धिंगाणिया चढ़ गये। वीडियो फिल्मांकन की लोकेशन बीकानेर की कोलायत तहसील का प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र परिसर है। कोलायत दबंग राजनेता देवीसिंह भाटी का 'एरियाÓ माना जाता है। लगभग चालीस वर्षों से क्षेत्र में देवीसिंह के दबदबे का जिक्र इस तरह किया जाता है कि बगैर उनकी इच्छा के कोई परिन्दा वहां पर भी नहीं मार सकता। यद्यपि उनकी उम्र के तकाजे और दुर्घटनाओं में दोनों पुत्रों को खो देने के बाद पिछले कुछ वर्षों में उनके इस दबदबे में कुछ कमी आ गई। उसी का परिणाम था कि क्षेत्र में अजेय माने जाने वाले देवीसिंह भाटी 2013 का विधानसभा चुनाव भाजपा उम्मीदवार के तौर पर 'मोदी-मोदीÓ माहौल के बावजूद हार गये।
देवीसिंह क्षेत्र की राजनीति में सुर्खियों में 1977 के लोकसभा चुनाव के दौरान आए। तब वे जनता पार्टी उम्मीदवार चौधरी हरीराम मक्कासर के साथ मानिकचन्द सुराना के कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय हुए। बाद में भाटी जनता दल से होते हुए भारतीय जनता पार्टी में पहुंच गए। बीच में तुनककर सामाजिक न्याय मंच नाम से क्षेत्रीय पार्टी भी बनाईलेकिन फिर भाजपा में लौट गए। उक्त वीडियो का समय देवीसिंह के उसी तुनककाल का है जब वे सामाजिक न्याय मंच से भाजपा के खिलाफ ताल ठोक चुके थे। सामाजिक न्याय मंच की स्थापना देवीसिंह ने भाजपा में रहते सामाजिक संगठन के तौर पर की और पार्टी में रहते हुए वे कोलायत के कपिल सरोवर में उग आयी जलखुंभी की आड़ में कमल को उखाड़ फेंकने की बात सार्वजनिक मंचों से करने लगे थे। 2003 के विधानसभा चुनावों से पहले अपने सामाजिक संगठन को राजनीतिक पार्टी में परिवर्तित कर लिया और कोलायत की राजनीतिक बिसात से कमल को एकबारी तो सचमुच उखाड़ दिया।
'कहीं पे निगाहें कहीं पर निशाना' वाले अपने उस आह्वान के चौदह वर्ष बाद उन्होंने पिछले वर्ष ही सरोवर से असल कमल बेलों को उखाडऩे की सुध ली। हालांकि पानी आते ही वह जलखुंभी लौट आई है, भाटी चाहे तो उसे उखाडऩे का द्विअर्थी आह्वान फिर से कर सकते हैं। लेकिन राज्यसभा में जाने की हाल की उनकी खेचळ ने जाहिर कर दिया है कि मगरे का शेर अपने को बूढ़ा और असहाय मानने लगा है। मगरा, कोलायत क्षेत्र की भौगोलिक पहचान है।
देवीसिंह के इस व्यक्तित्व बखान का मकसद यही है कि लोक में इस धारणा की पुष्टि कर सकते हैं कि उस वीडियो की स्क्रिप्ट और निर्देशन देवीसिंह भाटी कैम्प का ही था। वीडियो में जो चार नामनरेन्द्र पाण्डे, सुरेन्द्रसिंह, विष्णु जोशी और जेठूसिंह के चश्मदीदों द्वारा लिए जा रहे हैं, ये चारों युवा तब देवीसिंह कैम्प में ही थे। नरेन्द्र पाण्डे तो उसी दुर्घटना में दिवंगत हुए जिसमें देवीसिंह भाटी के बड़े बेटे पूर्व सांसद महेन्द्रसिंह हुए। विष्णु जोशी और जेठूसिंह वहीं रहे हैं जहां देवीसिंह भाटी रहे। एबीवीपी के सुरेन्द्रसिंह शेखावत हैं जो 2003 में एक ही वर्ष भाटी के साथ सामाजिक न्याय मंच में रहे और भाजपा में लौट आए। शेखावत आज उन बिरले संजीदा भाजपाई नेताओं में से हैं जो पढऩे-लिखने में विश्वास करते हैं। वीडियो देख जब एक पत्रकार मित्र से पुष्टि करनी चाही कि ये सुरेन्द्रसिंह कौन से हैं तो उन्होंने इस क्रेडिट लाइन के साथ पुष्टि की कि यह 'वाल्मीकि' सुरेन्द्रसिंह शेखावत ही हैं। मतलब दबंगई से राजनीति शुरू करने वाला कोई युवक संजीदा हो ले तो उन्हें यूं वाल्मीकि भी कहा जा सकता है।
किसी न्यूज चैनल के स्टिंगर द्वारा वीडियो कैमरे से फिल्माए इस वीडियो को अब पन्द्रह वर्ष बाद वायरल करने का मकसद तो करने वाला ही वही जानेलेकिन इसकी टाइमिंग के अपने निहितार्थ हैं। हर तरह से मन से लगभग हार चुके देवीसिंह भाटी के बारे में जो सुनते हैं कि वे पार्टी उच्च पदस्थों में अपने एक मात्र खैरख्वाह राजनाथसिंह के माध्यम से हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों में उम्मीदवारी पाकर अपने को सम्मानजनक स्थिति में पुन: पा लेना चाहते थे। हो सकता है वीडियो वायरल करने वाले का मकसद इसके माध्यम से देवीसिंह भाटी के लिए बाधा पैदा करना ही हो।
एक बार हार जाने और अजेय की छाप हटने से भाटी को शायद लगता हो कि 2018 के चुनाव में वे फिर हार गये तो दाग इतिहास का हिस्सा बन जायेगा। पोते अंशुमानसिंह की उम्र चुनाव लडऩे की अभी हुई नहीं सो खुद ना लडऩे का पुख्ता बहाना भी नहीं है। बीकानेर पूर्व से उनकी दावेदारी सिद्धिकुमारी के होते पार्टी शायद ही स्वीकारे।
खैर, वीडियो वायरल करने वाले का मकसद भले ही कुछ भी हो, इस वीडियो को देखने और गत पन्द्रह वर्षों की स्थानीय राजनीति पर नजर डालने पर यह तो समझ आ ही रहा है कि ये नेता लोग पार्टियों के नाम पर जनता को सिर्फ मूर्ख बनाते हैं और अपने स्वार्थ साधते हैं।
देवीसिंह भाटी खुद 2008 में चुनावों से पहले भाजपा में लौट आए और उक्त घटना के सभी आरोपियों पर से मुकदमें हटवा लिए। वीडियो में कटारिया की ढाल बने गोपाल गहलोत ने अपनी दबंगई देवीसिंह की छत्रछाया में शुरू की। संघ के द्वारिकाप्रसाद तिवाड़ी की रहनुमाई में भाजपा में नन्दू महाराज के साथ राजनीति शुरू की। हित टकराए तो देवीसिंह भाटी से दो-दो हाथ करने से नहीं चूके और 2013 के पिछले विधानसभा चुनावों से पूर्व तक 'स्वयंसेवक' रहे गोपाल गहलोत कांग्रेस में आकर बीकानेर पूर्व की उम्मीदवारी पा गए। उस वीडियो के दूसरे नायक दीपक अरोड़ा ने गोपाल गहलोत की रहनुमाई से दबंगई शुरू की और राजनीति करते हुए गहलोत के साथ ही कांग्रेस में आ लिए। अरोड़ा अब गोपाल गहलोत के समानांतर बीकानेर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से ही पंजाबी कोटे से कांग्रेस के टिकट की उम्मीद पाले हुए हैं। वहीं संजीदा हो लिए 'वाल्मीकि' सुरेन्द्रसिंह शेखावत भाजपा में सिद्धिकुमारी के विरुद्ध उम्मीदवारी की मंशा रखते हैं। वैसे देवीसिंह भाटी चाहें तो सिद्धिकुमारी से अपना कोई हिसाब चुकता करने के लिए पार्टी में सुरेन्द्रसिंह शेखावत की पैरवी कर सकते हैं।
जनता को अपनी मासूमियत को भुगतना है सो भुगतती रहे। ये नेतालोग उसे मूर्ख मानकर अपने-अपने स्वार्थ साधते रहेंगे।
दीपचन्द सांखला
15 मार्च, 2018