Thursday, August 17, 2017

प्रधानमंत्रीजी, जनता के वास्ते जुमले कहना छोड़ दें!

नरेन्द्र मोदी ने उस हुनर को साध रखा है, जिसमें अपने कहे को अवाम के अन्तरतम में पैठा सकें। ऐसे हुनर की विश्वसनीयता चाहे ना हो, वोट जरूर हासिल हो जाते हैं। इसी 15 अगस्त को नरेन्द्र मोदी ने लालकिले से चौथी बार संबोधित किया। जैसा प्रधानमंत्री ने बताया कि 'मन की बात' के श्रोताओं के आग्रह पर इस भाषण का समय कम रखा है, फिर भी लगभग 56 मिनट का हो ही गया वह। प्रधानमंत्री मोदी अपने कहे में जिस तरह की चतुराइयां बरतते रहे हैं उसे वैसे तो शातिरपना कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए, फिर भी चूंकि वे प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद को संभाले हैं तो इस तरह की शब्दावली से बचना जरूरी है।
गोरखपुर शिशु संहार की घटना अभी ताजा है। प्रधानमंत्री इसका उक्त भाषण में उल्लेख करेंगे इसकी उम्मीद इसलिए नहीं की, क्योंकि जो व्यक्ति इससे भी छोटी घटनाओं पर आए दिन ट्विट करे और गोरखपुर शिशु संहार पर सार्वजनिक तौर पर संवेदना प्रकट करना भी जरूरी नहीं समझे। हुआ भी लगभग वैसा ही, उन्होंने अपने इस भाषण में गोरखपुर की घटना को प्राकृतिक आपदाओं के जिक्र के साथ निबटा दिया। ऐसा इसलिए कि यह घटना जिस शहर में हुई, उस शहर के नुमाइंदे उस प्रदेश की सरकार के मुखिया हैं, जिन्हें विधायक न होते हुए केवल इसलिए मुख्यमंत्री बना दिया गया, क्योंकि वे प्रधानमंत्री मोदी के असल ऐजेण्डे की पूर्णता में सहायक रहे, रहेंगे।
इसे जुमलों में बात कहने का उतावलापन ही कहा जाएगा कि 21वीं सदी में जनमे किशोर-किशोरियों को अठारह वर्ष के हो चुकने पर नौजवान बताते हुए इस वर्ष को उन सब के लिए निर्णायक वर्ष बता दिया। जबकि जो 1 जनवरी, 2001 को भी जनमा वह भी 31 दिसम्बर, 2018 को 18 वर्ष का होगा और तभी वैधानिक तौर पर बालिग या नौजवान कहलाएगा। हां, यह जरूर है कि ऐसे किशोर-किशोरी लोकसभा चुनाव में मतदान के हकदार तभी हो पाएंगे जब मोदी मध्यावधि चुनाव ना कराएं। इसी तरह का उतावलापन उन्होंने मंगलयान का श्रेय लेते हुए दिखाया। मंगलयान का प्रक्षेपण 5 नवम्बर, 2013 को किया गया और वह 24 सितम्बर, 2015 को पहुंचा। इस तरह कुल समय लगा 10 माह 19 दिन जबकि प्रधानमंत्री ने इसे 9 महीने में पहुंचा देने की बात कही। उनके भाषण से यूं लगता है कि 26 मई 2014 को शपथ लेने के तुरन्त बाद बीच रास्ते में मंगलयान को धकियाने पहुंच गये मोदीजी!
कश्मीर पर और जातिवाद-सम्प्रदायवाद पर जो कुछ भी प्रधानमंत्री ने कहा उससे ठीक उलट आचरण, व्यवहार और प्रतिक्रियाएं संघानुगामियों और मोदीनिष्ठों की रही है। इसमें सुधार की बात तो दूर लगातार गिरावट ही दर्ज देखी जा रही है। प्रधानमंत्री के ऐसे उद्बोधन कहीं उस कंजूस दुकानदार जैसा संकेत तो नहीं है जिसमें दुकान पर आए ग्राहकों-मित्रों के लिए दो चाय का आदेश वे अपनी दो अंगुलियों को इनकार की मुद्रा में हिलाते हुए देता है, जिसका मतलब चायवाले को यही समझाया गया होता है कि चाय नहीं भेजनी है।
प्रधानमंत्रीजी ने तीन तलाक पीडि़ताओं की स्थिति पर चिंता जताई जो वाजिब ही है। अच्छा होता प्रधानमंत्री उन स्त्रियों की भी चिंता करते जिन्हें बिना तलाक दिये ही छोड़ दिया जाता है। ऐसी स्त्रियों की स्थिति उन तीन तलाक पीडि़ताओं से बदतर इसलिए होती है कि अपने संस्कारों के चलते उनमें से अधिकांश दूसरी शादी भी नहीं कर पाती।
देशवासियों को गरीबी से मुक्त कराने की बात पचास वर्ष पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शुरू की, तब समाजवाद के नारे के साथ सार्वजनिक क्षेत्र को विकसित करने जैसे कुछ सकारात्मक कदम भी उन्होंने उठाए। लेकिन अच्छा-खासा बहुमत मिलने के बाद वे भी लोकतांत्रिक पटरी से उतर गई और आपातकाल के बाद लगातार ऐसा कुछ होता रहा कि देश की आर्थिक दिशा ही बदल गई। आज पचास वर्ष बाद मोदीजी फिर गरीबी से मुक्ति की बात तो करते हैं, लेकिन ऐसी बातों के सर्वथा विपरीत आर्थिक नीतियों में वे ऐसा कर कैसे पाएंगे, उन्होंने नहीं बताया। असलियत तो यह है कि गरीब और अमीर के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है, गरीब ऐसी अवस्था को हासिल हो रहा है जिसके लिए जबानी करुणा कोई काम नहीं आती।
आम लोगों की तरह प्रधानमंत्री को भी लगता है कि केवल सैनिक ही देश के लिए अपना प्राण न्योछावर करते हैं। जबकि देश में ऐसी बहुत सी सेवाएं हैं जिन्हें अंजाम देते हुए बहुत से कर्मी आए दिन अपनी जान गवां बैठते हैं। अधिकांश तरह के कारखानों, रेलवे, रोड ट्रांसपोर्ट, पुलिस, अर्ध सैनिक बल और सिवर सफाई जैसे कामों में लगे सैकड़ों लोग आए दिन अपने परिजनों को छोड़ हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो लेते हैं। ऐसे कर्मी भी देश सेवा ही कर रहे होते हैं, लेकिन यह समझ से परे है कि ऐसी मौतों का उल्लेख देशसेवा के नाम से क्यों नहीं होता और ऐसी मौतों के बाद उनके परिजनों की सुध वैसे क्यों नहीं ली जाती जैसी सैनिकों के परिजनों की ली जाती है।
केवल सैनिकों की मौत को ही विशेष महत्त्व देना शेष सभी कर्मियों की मौत को कम आंकना है। इसे अन्यथा ना लें। सैनिक की मृत्यु के बाद पेंशन, परिजनों को आजीविका का साधन व आश्रितों को आजीवन विशेष सुविधाएं भी मिलती हैं। इस बात का उल्लेख इसलिए नहीं किया जा रहा है कि ऐसा नहीं होना चाहिए बल्कि इसलिए किया जा रहा है कि ऐसी सुविधाएं अन्य सेवाओं में लगे कर्मियों की मौत के बाद उनके आश्रितों को भी मिलें। सबसे बुरा हाल असंगठित क्षेत्र के सफाइकर्मियों के परिजनों का है। सामाजिक तौर पर सर्वाधिक शोषित समूह में आने वाले ये लोग सिवर सफाई जैसी आधुनिक व्यवस्था में आए दिन शिकार होते हैं, बावजूद इसके ना इन्हें जीते-जी कुछ विशेष हासिल होता है और मरने के बाद परिजनों को तो कुछ भी हासिल नहीं होता। प्रधानमंत्रीजी! ऐसों के उल्लेख के बिना गरीब की चिन्ता केवल ढोंग है और केवल सैनिकों का उल्लेख करना सूखा राष्ट्रवाद।
अवैध धन की मोदी बहुत बातें करते हैं। चुनाव जीतने के पहले वादा किया था कि विदेशों में जमा काला धन मात्र सौ दिन में ले आएंगे। उन्होंने ये भी कहा कि यह अवैध धन इतना होगा कि प्रत्येक नागरिक के हिस्से 15-15 लाख रुपये आ जाएंगे। इस वादे को तो उनके जोड़ीदार अमित शाह ने जुमला तक करार दे दिया है। वहीं अपने प्रधानमंत्री काल में नोटबन्दी जैसा अनाड़ीपन उन्होंने किया, उसकी लीपापोती करने से भी मोदीजी अपने उद्बोधन में नहीं चूके। चूंकि नोटबन्दी जैसे तुगलकी फरमान पर रिजर्व बैंक ने अभी तक ऐसे कोई आंकड़े नहीं दिए जिनसे प्रधानमंत्री को अपने उद्बोधन में नोटबन्दी पर खुश होने जैसी बात को पुष्ट करती हो और ना ही किसी प्रामाणिक अर्थशास्त्री ने इसे सकारात्मक निर्णय बताया। शायद इसलिए प्रधानमंत्री को बाहर के किसी एक्सपर्ट का नाम लिए बिना अपनी यह हवाई सफलता गिनवानी पड़ी।
अपने सभी कार्यक्रमों और योजनाओं की सफलताओं का उल्लेख प्रधानमंत्री ने अपने इस भाषण में किया। अफसोस यही है कि उनमें शायद ही कोई धरातल पर सफल होते दीख रही है। जैसा कि प्रधानमंत्री के लिए यह कहा जाता है कि वे अपने कहने के तरीके से रात को भी दिन बतला दें तो लोगबाग मान लेंगे कि दिन है, पर क्या इतने भर से उजाला हो जाता है? प्रधानमंत्रीजी, बस जनता के विवेक के जागने का इंतजार है। देखते हैं वह 2019 में जागता है या फिर 2024 में, या फिर जनता केवल रोटी पलटना ही जानती है। विवेक यदि नहीं जागता है तो उसे ठगे जाने और शोषित होते रहने से कोई रोक नहीं सकेगा।
दीपचन्द सांखला

17 अगस्त, 2017

Wednesday, August 2, 2017

अर्जुनरामजी, बीकानेर कई उम्मीदें पाले है आपसे! '

अर्जुनरामजी, बीकानेर कई उम्मीदें पाले है आपसे!
'घर आळा घट्टी चाटे, पांवणा ने पुडय़ां भावे', 'घर रा पूत कुंआरा डोले, पाड़ोस्या ने फेरा खुवावेऔर 'खुद भुआजी रा टाबर उघाड़ा घूमे, भतीजा रै झगल्या-टोपी सिंवावे'—लोक की सांगोपांग जानकारी रखने और उसकी मुनादी के लिए पाग पहनने वाले अर्जुनराम मेघवाल को इन कहावतों में से कौनसी एक धारण करनी है, इसका निर्णय करने में वे स्वयं सक्षम हैं। अन्यथा बाहैसियत वित्त राज्यमंत्री, भारत सरकार  उन्हें कुछ तो सुध बीकानेर की भी लेनी चाहिए। पद उन्हें बीकानेर संसदीय क्षेत्र की नुमाइंदगी के चलते मिला है और खुद उनके शहर में पिछले दो वर्षों से कोई स्थाई आयकर आयुक्त (अपील) नहीं है। इस पद पर 24 अगस्त 2015 के बाद से किसी नियमित अधिकारी की पोस्टिंग ही नहीं हुई है। जानते हैं अर्जुनरामजी को वित्त राज्यमंत्री की जिम्मेवारी 5 जुलाई 2016 से मिली। बावजूद इसके एक वर्ष तो निकल ही गया। जोधपुर में नियुक्त दो आयकर आयुक्त (अपील) में से एक को बीकानेर का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा हुआ है, जो पिछले दिनों चार महीनों बाद एक दिन के लिए बीकानेर आए, इस तरह आना और लौटना कार्य रूप में आधा दिन ही रह जाता है और अपीलें ज्यों की त्यों धरी रह जाती हैं।
वैसे मंत्री महोदय की जानकारी में होगा, फिर भी स्मरणार्थ बता दें कि राजस्थान में आयकर आयुक्त (अपील) के कुल ग्यारह पद हैं जिनमें पांच जयपुर में, दो जोधपुर में और एक-एक पद उदयपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर में है। बीकानेर को छोड़ शेष सभी ऐसे दस पदों पर आयुक्त कार्यरत हैं। लेकिन बीकानेर, जो खुद वित्त राज्यमंत्री का क्षेत्र है, का पद पिछले दो वर्षों से स्थाई आयुक्त की बाट जोह रहा है।
अर्जुनरामजी यूं तो उद्योगपतियों-व्यवसायियों का बहुत खयाल रखने वाले माने जाते हैं और उनके साथ अच्छा-खासा मेलजोल भी जब तब जाहिर करते रहते हैं। लेकिन आयकर आयुक्त (अपील) के इस पद पर स्थाई नियुक्ति न होने से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले उनके इस समुदाय की असुविधा की जानकारी उन तक क्यों नहीं पहुंची, आश्चर्य है।
आयकर आयुक्त (अपील) के पद पर नियमित अधिकारी न होने से उन बहुत से व्यापारियों के जिरह-फैसले रुके हुए हैं, जिन्होंने अपने पर लगे दण्ड और अतिरिक्त-करों के खिलाफ अपील कर रखी है। फैसला आने में देरी के चलते इसी आयकर से संबद्ध अन्य विभागों से दण्ड या अतिरिक्त-कर जमा कराने के सख्त तकादे भी उन्हें झेलने पड़ते हैं। जिन आयकर दाताओं ने हाइ डिमाण्ड के विरुद्ध अपीलें कर रखी हैं उन्हें परेशानियां ज्यादा उठानी पड़ रही हैं। मंत्रीजी, बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ के आयकर दाताओं की 1600 अपीलें इस नियमित नियुक्ति के अभाव में फाके खा रही हैं। क्या बीकानेर अपना वित्त राज्यमंत्री होने का दण्ड भुगत रहा है कि अन्य क्षेत्रों के शेष सभी दस पदों पर तो इसके समकक्ष नियमित पदाधिकारी नियुक्त हैं, लेकिन बीकानेर में नहीं। यह बात यदि मंत्रीजी ध्यान में नहीं है तो उन्हें शीघ्र ध्यान में लेनी चाहिए और अपने ही महकमें के इस पद पर किसी सक्षम अधिकारी की नियमित नियुक्ति का आदेश शीघ्रातिशीघ्र करवाना चाहिए। अन्यथा लोक को भलीभांति जानने-समझने वाले अर्जुनरामजी को शुरुआत में लिखे अखाणे सुनने पड़ सकते हैं।
जीएसटी ट्रिब्यूनल की स्थापना बीकानेर में हो
उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ के लिए जूझ रहे बीकानेर को कुछ राहत मंत्री महोदय दिलवा सकते हैं। देश में अभी-अभी लागू नई कर-प्रणालीमाल एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित ट्रिब्यूनल सभी राज्यों में अलग-अलग स्थापित होने हैं।
जयपुर-जोधपुर-अजमेर तो उच्च न्यायालय, आयकर ट्रिब्यूनल, राजस्थान कर बोर्ड और राजस्व मण्डल से पहले ही लाभान्वित हैं। अर्जुनराम मेघवाल के मंत्री रहते बीकानेर को जीएसटी ट्रिब्यूनल नहीं मिलेगा तो फिर कभी मिलना भी नहीं।
राजस्थान के इस उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र की शासनिक-प्रशासनिक तौर अब तक हुई उपेक्षाओं से मंत्री महोदय भलीभांति वाकिफ हैं। उम्मीद करते हैं कि अतिरिक्त रुचि और सक्रियता दिखा कर मंत्रीजी ना केवल नियमित पिछले दो वर्षों से रिक्त आयकर आयुक्त (अपील) की नियुक्ति अविलंब करवाएंगे बल्कि नये सिरे से स्थापित होने वाला जीएसटी ट्रिब्यूनल भी बीकानेर को दिलवाने में सक्षम होंगे।
मेड़तासिटी-पुष्कर रेल लाइन
वित्त राज्यमंत्री बनने पर अर्जुनरामजी को बधाई देते हुए बीकानेरियों ने यह उम्मीद जताई थी कि सर्वे की तकनीकी कवायद पूरी कर चुकी मेड़ता सिटी-पुष्कर रेल लाइन के बजट का प्रावधान करवाया जायेगा लेकिन यह उम्मीद अभी तक मुंह ही ताक रही है। सभी जानते हैं कि साठ किलोमीटर से भी कम लम्बाई की इस रेल लाइन का कार्य पूर्ण होने से सर्वाधिक लाभ बीकानेर क्षेत्र को होना है। इस केन्द्र सरकार का आगामी बजट एक तरह से आखिरी बजट होगा, उम्मीद करते हैं कि मंत्रीजी इस बजट में ऐसी व्यवस्था करवा पाएंगे कि इस रेल लाइन के वर्क-ऑर्डर शीघ्र जारी हो सकें।
दीपचन्द सांखला

3 अगस्त, 2017

Thursday, July 27, 2017

अमित शाह का तीन दिन का जयपुर प्रवास बहुत कुछ तय कर गया

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तीन दिन के प्रवास पर जयपुर हो कर गये हैं। इसे सामान्य या औपचारिक यात्रा नहीं कहा जा सकता। इस यात्रा का पार्टी और सरकार पर गहरा असर और दूरगामी परिणाम होंगे। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि निचले स्तर के पार्टी संगठनों तक पहुंचने के लिए अमित शाह की यह यात्रा बायपासीय पड़ाव है जिसमें राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके मोहरे प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी को बायपास कर दिया जाना है। असर तो यात्रा की घोषणा के साथ ही दिखाई देने लगे थे। प्रदेश भाजपा में लगभग सुप्रीमो की हैसियत बना चुकी वसुंधरा राजे पर इस तरह का दबाव तब से ही शुरू हो गया जब से मोदीजी प्रधानमंत्री बने और बाद इसके पार्टी की कमान शाह को मिली। लेकिन लम्बे अरसे तक राजे ने जोर आजमाइश जारी रखी, वहीं चतुर और शातिर मोदी एण्ड शाह एसोसिएट कम्पनी ने आत्मविश्वास के साथ धैर्य रखा और उलझने का अवसर नहीं आने दिया। उनकी इसी रणनीति का परिणाम था कि वसुंधरा राजे का विश्वास धीरे-धीरे डिगने लगा। राजे के टूटते आत्मबल ने जैसे ही गुंजाइश दी अमित शाह तीन दिनों के लिए बैठकों के विस्तृत कार्यक्रम के साथ आ धमके। जैसा कि ऊपर कहा कि शाह का यह आना कोरा यूं ही आकर चले जाना भर नहीं था। प्रदेश भाजपा की प्रत्येक इकाई के माध्यम से कार्यकर्ताओं तक शाह ने यह सन्देश पहुंचा दिया कि बजाय सरकार को मजबूत बनाने के पार्टी को मजबूत बनाने में लगें और प्रयास इस तरह के करें कि अगले पचीस वर्षों तक सभी तरह की सत्ताएं पार्टी के पास रहें।
शाह की इस पूरी कवायद के मानी यही निकल रहे हैं कि प्रदेश भाजपा की कमान कहने भर को परनामी के हाथों रहेगी, लेकिन अब चलेंगे शाह के ही तौर-तरीके। जिसके मानी यह भी हैं कि वसुंधरा को भी अब ठिठके रहना होगा, मुंह निकालने की कोशिश की तो निस्तेज करते देर नहीं लगेगी।
2013 के बाद से पार्टी पर लगातार पकड़ बढ़ाते मोदी एण्ड शाह की स्थितियां अब लगभग अजेय हो चुकी हैं। अनुकूल शासकीय माहौल के चलते और परोक्ष-अपरोक्ष तौर पर अपने ऐजेन्डे में लगातार सफलता मिलते रहने से पार्टी की पितृ संस्था आरएसएस भी इन दोनों पर लगभग मोहित है। वैसे भी वसुंधरा राजे भाजपा की गैर-संघी मुख्यमंत्री हैं। इसलिए संघ की सहानुभूति कभी राजे के साथ नहीं रही। ऐसे में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों को पार्टी कहने भर को वसुंधरा के नेतृत्व में भले ही लड़े लेकिन पिछले तीन विधानसभा चुनावों से आधी भी पकड़ वसुंधरा की रहेगी, नहीं लगता। पार्टी उम्मीदवारों के चयन तक में सब शाह की ही चलनी है। अभी से भारी दबाव में आ चुकी वसुंधरा समय की नजाकत देख हो सकता है सबकुछ बर्दाश्त कर लेंगी। इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है। पार्टी का लगभग अपहरण कर चुके मोदी और शाह अब तो अधिनायकों जैसी हैसियत भी पा चुके हैं। ऐसे में वसुंधरा वैसी अनुकूल परिस्थितियों में भी अपने को नहीं पाएंगी कि वह अपनी पसन्द सख्ती से रख भी सकें।
भाजपा प्रदेश में अगला चुनाव फिर जीतती हैजो फिलहाल दीख रहा हैतो वसुंधरा को उसके पिछले या बचे-खुचे तेवरों के साथ शासन दुबारा पार्टी नहीं सौंपेगीराजे को वर्तमान शासकीय हैसियत पुन: हासिल करने के लिए मोदी-शाह कम्पनी के आगे शत-प्रतिशत समर्पण दिखाना होगा। जैसा वसुंधरा का मिजाज रहा है, उसमें ऐसी गुंजाइश लगती कम है।
कुल तीन दिन के प्रवास में सन्देश यही देने की शाह की पूरी कोशिश रही कि पार्टी का मुख्य ऐजेन्डा पितृ संस्था आरएसएस और संघ के वर्तमान और पूर्व पितृ-पुरुषों की घोषित-अघोषित मंशाओं के अनुरूप देश को बनाना और चलाना है। यह इस बात से पुख्ता समझा जा सकता है कि शाह की इस यात्रा से कुछ दिन पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक दिखावे के लिए ही सही गो-रक्षकों के भेष में सक्रिय नरभक्षियों को भले ही चेतावनी दी हो मगर तत्संबंधी कोई सन्देश दबे स्वरों में भी शाह ने राज्य के भाजपाई कार्यकर्ताओं को दिया हो, जानकारी में नहीं। इसका सीधा सा मतलब यही है कि संघ और उसके अनुषंगी संगठनों की जैसी मंशा पिछले नब्बे वर्षों में रही है, उसे निर्बाध चलने दिया जाए। वोटों के धर्माधारित धु्रवीकरण के लिए वही सही है और पार्टी को सत्ता पर काबिज रखने के लिए अनुकूलतम भी।
वसुंधरा राजे जो अटलबिहारी वाजपेयी और भैरोंसिंह शेखावत की विरासत की राजनीति करती रही हैं, प्रकारांतर से वह कांग्रेस-संस्कृति की ही राजनीति मानी जाती है। इसीलिए संघ बहुत खुश कभी ना अटलबिहारी के शासन से रहा और ना भैरोसिंह शेखावत के और ना ही वसुंधरा राजे के शासन से। यही बड़ी प्रतिकूलता वसुंधरा राजे के लिए बनने जा रही है। इसी सब के चलते आगामी चुनाव की बिसात घोषित करना लगभग असंभव है। शाह राजस्थान में भी सभी तरह के मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर अधिनायकीय तरीके से वही सब करने वाले हैं जिससे सत्ता पुन: भाजपा को हासिल हो सके। अंत में पुन: यह लिखने में कोई संकोच नहीं है कि आगामी चुनाव में वसुंधरा की भूमिका कोई होगी भी तो जरूरत जितनी और कठपुतली जैसी। वसुंधरा यदि इसके लिए तैयार नहीं होंगी, तो छिटका दी जायेंगी।
दीपचन्द सांखला

27 जुलाई, 2017

Thursday, July 20, 2017

सोशल साइट्स जंगल की मानिंद, चिनगारी आग में तबदील होने में देर नहीं करेगी

'ईश्वर सत्य है' कहने वाले मोहनदास करमचंद गांधी ने अन्वेषण के बाद सत्य को ही ईश्वर माना। 'मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है' कहने वाले गांधी ने अपने जीने के तौर-तरीकों से यह बताया कि जो मानवीय है वह ही सत्य है। उनके व्यावहारिक जीवन से लगता है कि इस चर-अचर जगत की प्रत्येक इकाई के साथ अहिंसक और गरिमापूर्ण व्यवहार को ही उन्होंने मानवीयता की पात्रता माना। भ्रष्टाचार, बेईमानी, मिलावट, कर चोरी, हिंसा, झूठ-फरेब, भ्रमित करना, अन्य के अधिकारों का हनन, धर्म और जातीय आधार पर व्यवहार में अन्तर आदि-आदि के साथ न्यूनतम भरण-पोषण के अलावा प्रकृति का दोहन और लालच में जीव-अजीव पर हिंसा अमानवीय कृत्य है, इसलिए असत्य हंै।
आज यह बात जिस विशेष सन्दर्भ में कह रहे हैं, उसका खुलासा जरूरी है। बुद्धि के होते मनुष्य चंूकि जीवों में श्रेष्ठ है और वह झूठ का आभासी मण्डल घडऩे की चेष्टा करता रहा है। पिछली एक-डेढ़ सदी में तकनीक अपने नित-नये संचार साधनों के माध्यम से झूठ के इस आभासी मण्डल को विकराल बनाती जा रही है।
फेसबुक, ह्वाट्स एव, ट्विटर आदि से लोडेड स्मार्टफोन, मोबाइल आने से पहले पिछली सदी के आखिरी दशक में जब एसटीडी (सब्सक्राइबर ट्रंक डायलिंग) सेवाओं का विस्तार हुआ तब 1995 में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की बात कुछ ही घंटों में पूरे देश-विदेश में फैल गई।  उस झूठ को फैलाने के पीछे किसी की कोई मंशाविशेष थी या मात्र भक्तिभ्रम, नहीं कहा जा सकता। लेकिन उस भ्रम से निकलने में आस्थावान भारतीयों को ज्यादा दिन नहीं लगे।
मोबाइल के साथ जरूरत बन चुके कम्प्यूटरों के इस युग में ऐसे ही बड़े भ्रम की शिकार हुई पूरी आभासी दुनिया, 1 जनवरी, 2001 की मध्यरात्रि 12 बजे के ठीक बाद कम्प्यूटर सहज देखे गये तो उस बड़े भ्रम से मुक्ति मिली। हुआ यह था पिछली सदी के अंत में दक्षिण अमेरिका के किसी देश के एक अखबार के कोने में एक छोटी खबर इस आशंका के साथ लगी कि हो सकता है 31 दिसम्बर, 2000 की रात से दुनिया के सभी कम्प्यूटरों के प्रोग्राम 2001 में शिफ्ट ना हों। फिर क्या, बिना कम्प्यूटर वैज्ञानिकों से विमर्श किए इस खबर को मीडिया अधकचरे विशेषज्ञों के साथ विस्तार देता गया। यहां झूठ का उद्गम भक्ति-भ्रम नहीं, आशंका माना जा सकता है जिसे मीडिया के मतिभ्रम ने विकरालता दी। इसके ठीक बाद 2001 के मध्य में दिल्ली में मंकीमैन का भय व्याप्त हो गया। ऐसा कुछ भिन्न घटनाओं के साथ अन्य शहरों में होता रहा होगा। चूंकि दिल्ली देश की राजधानी है इसलिए इस घटना को मीडिया ने देशव्यापी खबर बना दिया। हो सकता है यह किसी खुराफाती दिमाग की उपज हो और लहर में बहकर अनेक ने विस्तार दे दिया। लेकिन अपनी छवि के विपरीत पुलिस ने इसे जल्द ही झूठा साबित कर दिया।
ऐसी सब घटनाएं बिना कुछ नुकसान किए नहीं गुजर जातीं, काम के घंटों, करोड़ों-अरबों के फिजूल खर्च और असल मुद्दों से भटकाव जैसे नुकसान के साथ सामूहिक छविक्षय का काम भी करती हैं।
फेसबुक, ह्वाट्स एप, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसी सोशल साइटों के साथ इस तरह के लोग अब ना केवल बेलगाम हो रहे हैं, बल्कि भय, भ्रम और आशंकाओं के साथ मनुष्य को हिंसक हो जाने के हेतु भी ये देने लगी हैं। लिखित में, दृश्य श्रव्य (राइटिंग, ऑडियो विजुअल) में बदलाव कर, नया घड़कर या सन्दर्भ बदलकरकुछ लोग स्वार्थ और विचारविशेष को बल देने के वास्ते जानबूझ कर ऐसा करने लगे हैं। इस शातिरपने का शिकार अकसर वे होने लगे हैं जो अविचारी हैं या आदतन तर्क-वितर्की नहीं हैं, और इनमें से कुछ प्रतिक्रिया भी देने लगे हैं। ऐसी प्रतिक्रियाओं को कुछ की मासूमियत मान सकते हैं, जैसे कुछ भी मैसेज, फोटो या ऑडियो आया, उसे सुने या बिना पूरा सुने अन्यों के साथ साझा करने में देर नहीं लगाते, यह भी नहीं सोचते कि बिना पुष्टि किए और बिना यह विचारे ऐसा किये जाने से देश और समाज की सामंजस्यता को नुकसान हो सकता है या किसी की गरिमा भी आहत हो सकती है।
फेसबुक, ह्वाट्स एच, ट्विटर आदि पर झूठी पोस्टों, झूठे फोटों और झूठे ऑडियो की बाढ़ सी पिछले एक अरसे से आने लगी है। इतना ही नहीं, हाल ही के वर्षों में कुछ अखबार और टीवी चैनल भी फेक न्यूज, पढ़ाने-दिखाने लगे हैं। इन सब का मोटा-मोट मकसद राजनीतिक है, येन-केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना या सत्ता में बने रहना। इसके लिए वे बिना दया-हया के बेधड़क कुछ भी करने लगे हैं। अधिकांशत: धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर मासूम लोग इनके वाहक (कुरियर) भी बन जाते हैं।
स्वदेशी की अलख जगाने वाले राजीव दीक्षित की असामयिक मृत्यु के बाद इन सोशल साइटों पर उनके नाम का सर्वाधिक दुरुपयोग हुआ है, हर कोई अपने अंडबंड विचार उनके नाम से पेल रहा है। खुद गांधी और जवाहरलाल नेहरू की छवि खराब करने का जो काम आजादी के बाद से धीमी गति से चल रहा है उसे संचार के आधुनिक साधनों ने न केवल गति दी बल्कि अश्लील भी बनाया है। जनगणना के आंकड़ों को दरकिनार कर जनसंख्या के धर्म आधारित झूठे आंकड़ों के माध्यम से वैमनस्य फैलाया जाने लगा है।
इस दौर के किसी नेता के लिए यह कहना कि वह भ्रष्ट नहीं है, असंभव है। इसकी बड़ी जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी है जिसने आजादी बाद सर्वाधिक शासन किया। लेकिन इसके मानी यह कतई नहीं है कि अन्य पार्टियों के नेता दूध के धुले हैं। राजनीति और चुनावी-तंत्र जिस तरह खर्चीला हो गया है उसमें तो ऐसा कतई संभव नहीं।
अब तो और भी मुश्किल दौर आ गया है। सत्ता पर जो काबिज हैं उनका मकसद ही येन-केन देश को हिन्दुत्वी राष्ट्र बनाना है। इसके लिए देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की सफलताएं परवान पर हैं। अपने पितृ संगठन के नेतृत्व में अपने इस मकसद से यह विचारधारा ना तब विचलित हुई जब देश गुलाम था, आजादी इनका मकसद तब भी नहीं था। आपातकाल में भी ये विचलित नहीं हुए, तब भी इनका मकसद लोकतंत्र नहीं था।
गांधी ने कहा, 'सत्य साध्य है, अहिंसा साधन है।' लेकिन इन अधिनायकीय सत्ताकांक्षियों का मानना कुछ दूसरा है:—'हिन्दुत्वी राष्ट्र साध्य है, झूठ और हिंसा साधन हैं।' दूसरी ओर भयभीत मानसिकता के चलते अल्पसंख्यक भी संयम नहीं रख पा रहे हैं। एक तरफ से थूका-थूकी होती है तो दूसरी तरफ से कुत्ता-फजीती शुरू करने में देर नहीं की जाती।
इस देश की तासीर समुद्र की सी रही है जो अपने में सभी को समा लेता है। तासीर बदलने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। ईश्वर, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरु आदि-आदि ऐसे छुईमुई से हैं कि उन्हें या उन पर कुछ भी अंडबंड कह देने भर से वे खिरने लगते हैं तो ईश्वर, अल्लाहगॉड, वाहेगुरु आदि-आदि होने की वे पात्रता नहीं रखते।
वर्तमान आर्थिक नीतियों और सामाजिक असमानताओं के बढ़ते यह समय घोर निराशाजनक हो गया है। पूंजी लगातार एक छोटे समूह में सिमटती जा रही है और हम हैं कि इस सत्य को देखना-समझना ही नहीं चाहते और धर्म के नाम पर अपने राजनीतिक हित साधने वालों के औजार बनते जा रहे हैं। सोशल साइट्स व संचार के ये साधन तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों को जंगल की आग में तबदील करते देर नहीं लगाते। इसलिए इन साधनों को बरतते वक्त ना केवल सावधान रहना होगा बल्कि प्रतिक्रिया करते वक्त ठिठकते भी रहना जरूरी है। सत्य ही ईश्वर है और उसकी प्रतिष्ठा मानवीयता की पात्रताएं विकसित किये बिना संभव नहीं है।
दीपचन्द सांखला

20 जुलाई, 2017

Thursday, July 13, 2017

नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों का पलायन : कुछ तथ्य --अशोक कुमार पाण्डेय

1. 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में आतंकवाद के चरम के समय बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया। पहला तथ्य संख्या को लेकर। कश्मीरी पंडित समूह और कुछ हिन्दू दक्षिणपंथीयह संख्या चार लाख से सात लाख तक बताते हैं। लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या से बहुत अधिक है। असल में कश्मीरी पंडितों की आखिरी गिनती 1941 में हुई थी और उसी से 1990 का अनुमान लगाया जाता है। इसमें 1990 से पहले रोजग़ार तथा अन्य कारणों से कश्मीर छोड़कर चले गए कश्मीरी पंडितों की संख्या घटाई नहीं जाती। अहमदाबाद में बसे कश्मीरी पंडित पी एल डी परिमू ने अपनी किताब 'कश्मीर एंड शेर-ए-कश्मीर : अ रिवोल्यूशन डीरेल्ड' में 1947-50 के बीच कश्मीर छोड़ कर गए पंडितों की संख्या कुल पंडित आबादी का 20 प्रतिशत बतायी है, (पेज़-244), चित्रलेखा ज़ुत्शी ने अपनी किताब 'लेंग्वेजेज़ ऑफ़ बिलॉन्गिंग : इस्लाम, रीजनल आइडेंटीटी, एंड मेकिंग ऑफ़ कश्मीर' में इस विस्थापन की वज़ह नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा लागू किये गए भूमि सुधार को बताया है (पेज़-318) जिसमें जम्मू और कश्मीर में ज़मीन का मालिकाना उन गऱीब मुसलमानों, दलितों तथा अन्य खेतिहरों को दिया गया था जो वास्तविक खेती करते थे, इसी दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम और राजपूत ज़मींदार भी कश्मीर से बाहर चले गए थे। ज्ञातव्य है कि डोगरा शासन के दौरान डोगरा राजपूतों, कश्मीरी पंडितों और कुलीन मुसलमानों के छोटे से तबके ने कश्मीर की लगभग 90 फ़ीसद ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया था। (विस्तार के लिए देखें 'हिन्दू रूलर्स एंड मुस्लिम सब्जेक्ट्स', मृदुराय) इसके बाद भी कश्मीरी पंडितों का नौकरियों आदि के लिए कश्मीर से विस्थापन जारी रहा (इसका एक उदाहरण अनुपम खेर हैं जिनके पिता 60 के दशक में नौकरी के सिलसिले में शिमला आ गए थे)। सुमांत्रा बोस ने अपनी किताब 'कश्मीर : रूट्स ऑफ़ कंफ्लिक्ट, पाथ टू पीस' में यह संख्या एक लाख बताई है ( पेज़ 120), राजनीति विज्ञानी अलेक्जेंडर इवांस विस्थापित पंडितों की संख्या डेढ़ लाख से एक लाख साठ हज़ार बताते हैं, परिमू यह संख्या ढाई लाख बताते हैं। सीआइए ने एक रिपोर्ट में यह संख्या तीन लाख बताई है। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य अनंतनाग के तत्कालीन कमिश्नर आइएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह 'कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति, श्रीनगर' की 7 अप्रैल, 2010 के प्रेस रिलीज़ के हवाले से बताते हैं कि लगभग 3,000 कश्मीरी पंडित परिवार स्थितियों के सामान्य होने के बाद 1998 के आसपास कश्मीर से पलायित हुए थे (देखें, पेज़ 79, माई कश्मीर : द डाइंग ऑफ़ द लाइट, वजाहत हबीबुल्ला)। बता दें कि कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति इन भयानक स्थितियों के बाद भी कश्मीर से पलायित होने से इनकार करने वाले पंडितों का संगठन है। अब भी कोई साढ़े तीन हज़ार कश्मीरी पंडित घाटी में रहते हैं, बीस हज़ार से अधिक सिख भी हैं और नब्बे के दशक के बाद उन पर अत्याचार की कोई बड़ी घटना नहीं हुई। हां, हर आम कश्मीरी की तरह उनकी अपनी आर्थिक समस्याएं हैं जिस पर अकसर कोई ध्यान नहीं देता. हाल ही में तीस्ता सीतलवाड़ ने उनकी मदद के लिए अपील जारी की थी। साथ ही एक बड़ी समस्या लड़कों की शादी को लेकर है, क्योंकि पलायन कर गए कश्मीरी पंडित अपनी बेटियों को कश्मीर नहीं भेजना चाहते।
गुजरात हो कि कश्मीर, भय से एक आदमी का भी अपनी ज़मीन छोडऩा भयानक है, लेकिन संख्या को बढ़ा कर बताना, बताने वालों की मंशा को साफ़ करता ही है।
2. उल्लिखित पुस्तक में ही परिमू ने बताया है कि उसी समय लगभग पचास हज़ार मुसलमानों ने घाटी छोड़ी। कश्मीरी पंडितों को तो कैम्पों में जगह मिली, सरकारी मदद और मुआवजा भी। लेकिन मुसलमानों को ऐसा कुछ नहीं मिला (देखें, वही)। सीमा काजी अपनी किताब 'बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन' में ह्यूमन राइट वाच की एक रपट के हवाले से बताती हैं कि 1989 के बाद से पाकिस्तान में 38,000 शरणार्थी कश्मीर से पहुंचे थे। केप्ले महमूद ने अपनी मुजफ्फराबाद यात्रा में पाया कि सैकड़ों मुसलमानों को मार कर झेलम में बहा दिया गया था। इन तथ्यों को साथ लेकर वह भी उस दौर में सेना और सुरक्षा बलों के अत्याचार से 48,000 मुसलमानों के विस्थापन की बात कहती हैं। इन रिफ्यूजियों ने सुरक्षा बलों द्वारा, पिटाई, बलात्कार और लूट तक के आरोप लगाए हैं। अफ़सोस कि 1947 के जम्मू नरसंहार (विस्तार के लिए इंटरनेट पर वेद भसीन के उपलब्ध साक्षात्कार या फिर सईद नक़वी की किताब 'बीइंग द अदर' के पेज़ 173-193) की तरह इस विस्थापन पर कोई बात नहीं होती।
3. 1989-90 के दौर में कश्मीरी पंडितों की हत्याओं को लेकर भी सरकारी आंकड़े में सवा सौ और कश्मीरी पंडितों के दावे सवा छ: सौ के बीच भी काफ़ी मतभेद है। लेकिन क्या उस दौर में मारे गए लोगों को सिफऱ् धर्म के आधार पर देखा जाना उचित है।
परिमू के अनुसार हत्यारों का उद्देश्य था कश्मीर की अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था और प्रशासन को पंगु बना देने के साथ अपने हर वैचारिक विरोधी को मार देना। इस दौर में मरने वालों में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद युसुफ़ हलवाई, मीरवायज़ मौलवी फ़ारूक़, नब्बे वर्षीय पूर्व स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी मौलाना मौदूदी, गूजर समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित नेता क़ाज़ी निसार अहमद, विधायक मीर मुस्तफ़ा, श्रीनगर दूरदर्शन के डायरेक्टर लासा कौल, एचएमटी के जनरल मैनेजऱ एच एल खेरा, कश्मीर विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफ़ेसर मुशीर उल हक़ और उनके सचिव अब्दुल गनी, कश्मीर विधान सभा के सदस्य नाजिऱ अहमद वानी आदि शामिल थे (वही, पेज़ 240-41)। ज़ाहिर है आतंकवादियों के शिकार सिफऱ् कश्मीरी पंडित नहीं, मुस्लिम भी थे। हां, पंडितों के पास पलायित होने के लिए जगह थी, मुसलमानों के लिए वह भी नहीं। वे कश्मीर में ही रहे और आतंकवादियों तथा सुरक्षा बलों, दोनों के अत्याचारों का शिकार होते रहे।
जगमोहन के कश्मीर में शासन के समय वहां के लोगों के प्रति रवैये को जानने के लिए एक उदाहरण काफी होगा। 21 मई 1990 को मौलवी फ़ारूक़ की हत्या के बाद जब लोग सड़कों पर आ गए तब तक वे एक आतंकवादी संगठन के खि़लाफ़ थे लेकिन जब उस जुलूस पर सेना ने गोलियां चलाईं और भारतीय प्रेस के अनुसार 47 (और बीबीसी के अनुसार 100 लोग) गोलीबारी में मारे गए तो यह गुस्सा भारत सरकार के खि़लाफ़ हो गया (देखें, कश्मीर : इसरजेंसी एंड आफ़्टर, बलराज पुरी, पेज़-68)। गौकादल में घटी यह घटना नब्बे के दशक में आतंकवाद का मूल मानी जाती है। उन दो-तीन सालों में मारे गए कश्मीरी मुसलमानों की संख्या 50,000 से एक लाख तक है। श्रीनगर सहित अनेक जगहों पर सामूहिक क़ब्रें मिली हैं। आज भी वहां हज़ारों माएं और ब्याहताएं 'आधी' हैंउनके बेटों/पतियों के बारे में वे नहीं जानती कि वे जि़ंदा हैं भी या नहीं, बस वे लापता हैं। (आप तमाम तथ्यों के अलावा शहनाज़ बशीर का उपन्यास 'द हाफ़ मदर' पढ़ सकते हैं।)
4. कश्मीर से पंडितों के पलायन में जगमोहन की भूमिका को लेकर कई बातें होती हैं। पुरी के अनुसार जगमोहन को तब भाजपा और तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के कहने पर कश्मीर का गवर्नर बनाया गया। उन्होंने फ़ारूक़ अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त कर सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे। अल जज़ीरा को दिए एक साक्षात्कार में मृदुराय ने इस संभावना से इनकार किया है कि योजनाबद्ध तरीक़े से इतनी बड़ी संख्या में पलायन संभव है। लेकिन वह कहती हैं कि जगमोहन ने पंडितों को कश्मीर छोडऩे के लिए प्रेरित किया वजाहत हबीबुल्लाह पूर्वोद्धृत किताब में बताते हैं कि उन्होंने जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से एक अपील करने को कहा था कि वे यहां सुरक्षित महसूस करें और सरकार उनको पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी। लेकिन जगमोहन ने मना कर दिया, इसकी जगह अपने प्रसारण में उन्होंने कहा कि 'पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैम्प बनाये जा रहे हैं, जो पंडित डरा हुआ महसूस करें वे इन कैम्पस में जा सकते हैं, जो कर्मचारी घाटी छोड़ कर जायेंगे उन्हें तनख्वाहें मिलती रहेंगी।' ज़ाहिर है इन घोषणाओं ने पंडितों को पलायन के लिए प्रेरित किया। (पेज़ 86 ; मृदुराय ने भी इस तथ्य का जि़क्र किया है)। कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और पत्रकार बलराज पुरी ने अपनी किताब 'कश्मीर : इंसरजेंसी एंड आफ़्टर' में जगमोहन की दमनात्मक कार्यवाहियों और रवैयों को ही कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुख्य जि़म्मेदार बताया है (पेज़ 68-73)। ऐसे ही निष्कर्ष वर्तमान विदेश राज्यमंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम जे अकबर ने अपनी किताब 'बिहाइंड द वेल' में भी दिए हैं (पेज़ 218-20)। कमिटी फॉर इनिशिएटिव ऑन कश्मीर की जुलाई 1990 की रिपोर्ट 'कश्मीर इम्प्रिजंड' में नातीपुरा, श्रीनगर में रह रहे एक कश्मीरी पंडित ने कहा कि 'इस इलाक़े के कुछ लोगों ने दबाव में कश्मीर छोड़ा। एक कश्मीरी पंडित नेता एच एन जट्टू लोगों से कह रहे थे कि अप्रेल तक सभी पंडितों को घाटी छोड़ देना है। मैंने कश्मीर नहीं छोड़ा, डरे तो यहां सभी हैं लेकिन हमारी महिलाओं के साथ कोई ऐसी घटना नहीं हुई।' 18 सितम्बर, 1990 को स्थानीय उर्दू अखबार अफ़साना में छपे एक पत्र में के एल कौल ने लिखा— 'पंडितों से कहा गया था कि सरकार कश्मीर में एक लाख मुसलमानों को मारना चाहती है जिससे आतंकवाद का ख़ात्मा हो सके। पंडितों को कहा गया कि उन्हें मुफ़्त राशन, घर, नौकरियां आदि सुविधायें दी जायेंगी। उन्हें यह कहा गया कि नरसंहार ख़त्म हो जाने के बाद उन्हें वापस लाया जाएगा।' हालांकि ये वादे पूरे नहीं किये गए पर कश्मीरी विस्थापित पंडितों को मिलने वाला मासिक मुआवज़ा भारत में अब तक किसी विस्थापन के लिए दिए गए मुआवज़े से अधिक है। समय समय पर इसे बढ़ाया भी गया, आखिऱी बार उमर अब्दुल्ला के शासन काल में। आप गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर इसे देख सकते हैं।
बलराज पुरी ने अपनी किताब में दोनों समुदायों की एक संयुक्त समिति का जि़क्र किया है जो पंडितों का पलायन रोकने के लिए बनाई गई थी। इसके सदस्य थेहाईकोर्ट के पूर्व जज मुफ़्ती बहाउद्दीन फ़ारूकी (अध्यक्ष), एच एन जट्टू (उपाध्यक्ष) और वरिष्ठ वक़ील गुलाम नबी हगू्र (महासचिव)। ज्ञातव्य है कि 1986 में ऐसे ही एक प्रयास से पंडितों को घाटी छोडऩे से रोका गया था। पुरी बताते हैं कि हालांकि इस समिति की कोशिशों से कई मुस्लिम संगठनों, आतंकी संगठनों और मुस्लिम नेताओं ने घाटी न छोडऩे की अपील की, लेकिन जट्टू ख़ुद घाटी छोड़कर जम्मू चले गए। बाद में उन्होंने बताया कि समिति के निर्माण और इस अपील के बाद जगमोहन ने उनके पास एक डीएसपी को जम्मू का एयर टिकट लेकर भेजा जो अपनी जीप से उन्हें एयरपोर्ट छोड़ कर आया, उसने जम्मू में एक रिहाइश की व्यवस्था की सूचना दी और तुरत कश्मीर छोड़ देने को कहा! ज़ाहिर है जगमोहन पलायन रोकने की कोशिशों को बढ़ावा देने की जगह दबा रहे थे। (पेज़ 70-71)
कश्मीरी पंडितों का पलायन भारतीय लोकतंत्र के मुंह पर काला धब्बा है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह है कि क़ाबिल अफ़सर माने जाने वाले जगमोहन कश्मीर के राज्यपाल के रूप में घाटी में लगभग 4,00,000 सैनिकों की उपस्थिति के बावज़ूद पंडितों के पलायन को रोक क्यों न सके? अपनी किताब 'कश्मीर : अ ट्रेजेडी ऑफ़ एरर्स' में तवलीनसिंह पूछती हैंकई मुसलमान यह आरोप लगाते हैं कि जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी छोडऩे के लिए प्रेरित किया। यह सच हो या नहीं लेकिन यह तो सच ही है कि जगमोहन के कश्मीर में आने के कुछ दिनों के भीतर ये समूह में घाटी छोड़ गए और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि जाने के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराये गए।'
मित्रों से अनुरोध है कि कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति और उसके कर्ता धर्ता संजय टिक्कू के बयान और साक्षात्कार पढ़ लें। मिल जाएंगे इंटरनेट पर बिखरे।
असल में जैसा कि एक कश्मीरी पंडित उपन्यासकार निताशा कौल कहती हैं--कश्मीरी पंडित हिंदुत्व की ताक़तों के राजनीतिक खेल के मुहरे बन गए हैं। विस्तार के लिए वायर में छपा उनका 7 जुलाई, 2016 का लेख पढ़ लें। जब निताशा ने अल जज़ीरा के एक प्रोग्राम में राम माधव का प्रतिकार किया तो कश्मीरी पंडितों के संघ समर्थक समूह के युवाओं ने उनको भयानक ट्रॉल किया। दिक्क़त यह है कि भारतीय मीडिया संघ से जुड़े पनुन कश्मीर (पूर्व में सनातन युवक सभा) को ही कश्मीरी पंडितों का इकलौता प्रतिनिधि मानता है। वह दिल्ली में रह रहे बद्री रैना जैसे कश्मीरी पंडितों के पास भी नहीं जाना चाहता
(लेखक की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'कश्मीरनामा' से)