Thursday, November 16, 2017

डॉक्टरों की हड़ताल और फिल्म पद्मावती के बहाने अपने समाज को आईने में देखने की कोशिश

समाज को स्वयं के अवलोकन के लिए किसी बाहरी-भौतिक आईने की जरूरत नहीं होती। कोई  ऐसा प्रयास कर भी रहा है तो वह या तो अपने को बहला रहा होता है या खुद ही को धोखा दे रहा है। चूंकि समाज बहुआयामी होता है अत: उसका एक आयाम दूसरे के आईने की भूमिका निभा रहा होता है। बस जरूरत इतनी ही है कि हम ऐसे विवेक को अपने में साध लें। प्रतिकूलता यही है कि इस दौर में ऐसा विवेक समाज से लगातार गायब होता जा रहा है।
हाल के दो आन्दोलनों से इसके आकलन और समझ से रू-बरू हो सकते हैं। पहला, राजस्थान में सरकारी सेवारत डॉक्टरों की हड़ताल और दूसरा संजय लीला भंसाली की आने वाली फिल्म पद्मावती के हो रहे भयावह विरोध से।
डॉक्टरों और शासन के बीच समझौता हो चुका है और डॉक्टर काम पर लौट आए हैं। ऐसी घटनाओं के अच्छे-बुरे परिणामों को भूलने की समय सीमा इस दौर में जिस गति से सिकुड़ रही है, उस पर विचारने से चिन्ता होने लगती है कि इस तरह संवेदनाएं समाज में बचेंगी भी कि नहीं। (बुरे परिणामों में वे खबरें हैं जिनसे मालूम होता है कि डॉक्टरों की इस हड़ताल के चलते कई मरीज इलाज के अभाव में मर गये।)
डॉक्टरों की यह हड़ताल टूटने से एक दिन पूर्व के अपने ट्वीट को साझा कर रहा हूं। डॉक्टरों को उनकी इस हड़ताल के लिए भुंडाए जाने पर चाहें तो इस ट्वीट से पूरे परिदृश्य का आकलन कर सकते हैं।
राजस्थान में डॉक्टरों की हड़ताल : जिस समाज का प्रत्येक समर्थ घोर लालच और स्वार्थ की लालसा मन में रखने लगा हो, वहां डॉक्टरों से तो क्या, किसी से भी मानवीय होने की कामना बेमानी है।
इसे और खोलकर कहने की गुंजाइश तो नहीं लगती, फिर भी यह समझना पर्याप्त है कि जब समाज के सर्वाधिक प्रभावी समर्थ नेताओं में अधिकांश भ्रष्ट हों, अधिकांश अधिकारी-उच्चाधिकारी भ्रष्ट हों तथा लगभग व्यापारिक और औद्योगिक घराने भ्रष्ट हों, उस समाज में 'धरती के भगवानÓ जैसे जुमलों से डॉक्टरों को प्रभावित करने की कोशिश व्यर्थ है। ऐसे सामाजिक हालातों में वे भी संवेदनहीन और भ्रष्ट क्यों नहीं हो सकते।
इसी तरह से प्रदेश में और आसपास के प्रदेशों के उन इलाकों में जहां प्रभावी क्षत्रिय आबादी है, वहां-वहां संजय लीला भंसाली की आने वाली फिल्म पद्मावती का विरोध हिंसक चेतावनियों के साथ हो रहा है।
चिंता यह नहीं है कि भंसाली की पद्मावती रिलीज हो पाती है कि नहीं; असल खतरा अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ती दबंगई से है। अभिव्यक्ति की आजादी की जब बात कर रहे हैं, तब विवेकसम्मत तरीके से कहने की आजादी की बात ही कर रहे होते हैं, किसी अनर्गलता की नहीं। यूं तो इतिहास पर विवाद खड़े किए जाते रहे हैं लेकिन ऐसे इतिहासकार, जिनकी दुनिया के अपने समकक्षों में प्रतिष्ठा है, उनके कहे को खारिज करते हैं तो अराजकता की हद तक जाकर किसी भी तथ्य को खारिज कर सकते हैं। ऐसी प्रवृत्ति समाज के उन समूहों में लगातार बढ़ती दीखने लगी है, जिन्हें सामान्यत: समर्थ, समृद्ध और दबंग माना जाता रहा है।
व्यक्ति की कल्पना से अनर्थ भी सृजित हो सकते हैं, जायसी ने नहीं सोचा होगा कि पद्मावती को लेकर जो काव्य उन्होंने रचा उसे इतिहास मान कर बखेड़ा खड़ा कर दिया जायेगा। के. आसिफ ने कभी मुगले आजम बनाई, इस असहिष्णु समय में उसे बनाना संभवत: संभव ही नहीं होता।
पद्मावती फिल्म अभी तक ना रिलीज हुई है, और ना इसकी अभी तक कोई स्क्रीनिंग हुई है, सेंसर बोर्ड ने भी अभी तक इसे पास नहीं किया है। चिन्ता की वजह यही है कि केवल सुनी-सुनाई बातों पर यकीन कर एक समर्थ और शिक्षित समूह इस पर विचार और विमर्श की बिना गुंजाइश रखे किस कदर उद्वेलित हुआ जा रहा है।
राजस्थान खासकर क्षत्रिय समाज का लोकप्रिय घूमर नृत्य पद्मावती के लिए फिल्माया गया है, उसकी वीडियो क्लिप फिल्म के प्रचारार्थ जारी वीडियो में से एक है, जिसे टीवी चैनलों में कई बार दिखाया जाने लगा है। बिना उसे गौर से देखे विरोध इसलिए हो रहा है कि उसमें रानी को बिना घूंघट के नचवा दिया। इस गीत को देखने से लगता है कि निर्देशक ने इसके फिल्मांकन में समाज की मर्यादाओं का पूरा खयाल रखा है। इस गाने में एकमात्र जिस पुरुष को दिखाया गया, वह पद्मावती के पति राजा रतनसेन ही हैं। कोई अन्य पुरुष इस गीत के दौरान किसी फ्रेम में दिखाई नहीं देता। जो समाज यदि इतनी छूट भी नहीं देता, उसे अपने भीतर झांकना शुरू कर देना चाहिए, अन्यथा तकनीक के चलते जिस गति से समाज के अन्तर्संबंधों में बदलाव आ रहे हैं उसमें वे ना केवल अप्रासंगिक हो जाएंगे बल्कि अपनी आगामी पीढिय़ों के लिए अलग तरह की कुंठाओं को भी बो रहे हैं।
इस फिल्म पर आए दूसरे जिस एतराज को खुद भंसाली ने सिरे से ही खारिज किया है, वह है अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के बीच किसी फैंटेसी-दृश्य का होना। फिर भी भंसाली एतराज करने वाले समाज के प्रतिनिधियों को फिल्म रिलीज करने से पूर्व दिखाने को तैयार हैं। समाज के संजीदा लोगों को आगे आना चाहिए। ये ज्यादा चिंताजनक है जब कुछ संजीदा सामाजिक लोग भी राजनीतिक नफे-नुकसान का आकलन कर या तो चुप रहते हैं या विरोध की रस्म अदायगी भी करने लगे हों।
अपनी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में फिल्मों में अनर्गलता नियन्त्रण के लिए सरकार की ओर से सेंसर बोर्ड भी बना हुआ है। यदि लगता है कि वह भी जिम्मेदारी से काम नहीं कर रहा है तो फिर अपने सामाजिक होने की पड़ताल के लिए भी आईना क्यों न देखेंहम खुद कितने जिम्मेदार हैं।
दीपचन्द सांखला

16 नवम्बर, 2017

Sunday, November 12, 2017

जिस पद्मावती पर घमासान मची है, उस कवि की कल्पना का अवलोकन तो करलें; वह इतिहास है या कोरी कल्पना।

#पद्मावत की प्रेम कहानी
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जिस पद्मावत के इतिहास की चर्चा आजकल जोर शोर से हो रही है उसके ब्रांड अम्बेसडर यानी लेखक मालिक मोहम्मद जायसी के "पद्मावत" अनुसार पदमिनी ने 1303 में जौहर कर लिया था ! लेकिन पद्मावत ग्रंथ की रचना हुई थी 1597 में ! अब लगभग 290 साल बाद मिली दिव्य द्रष्टि को छोड़ भी दिया जाये और थोड़ा सा भी दिमाग लगाकर सोचे तो - 16000 रानियों ने जौहर किया 30000 सैनिको ने शाका किया इस हिसाब से किले में रहने वाली कम से कम जनसँख्या होगी लगभग 1.50 लाख ! चित्तौड़ जैसे पहाडी दुर्ग में जहाँ रहने को केवल महल था उसमे इतने लोगों का रह पाना असम्भव हि लगता है !
खैर इसको छोड़कर मूल कहानी पर आते है जो पुराण, वेद, रामायण, महाभारत से भी मजेदार है !
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कहानी की शुरुवात होती है हीरामन नामक तोते से जिसने खूबसूरत पदमिनी को नहाते हुए देखा और राजा रतनसेन के सामने उसके रूप का लम्बा चौड़ा वर्णन किया ! उस वर्णन को सुन राजा बेसुध हो गया उसके हृदय में ऐसा अभिलाष जगा कि वह हीरामन को साथ ले जोगी होकर घर से निकल पड़ा ! उसके साथ सोलह हजार सैनिक भी जोगी होकर चले !
दुर्गम स्थानों के बीच होते हुए सब लोग कलिंग देश में पहुँचे ! वहाँ के राजा गजपति से जहाज लेकर रत्नसेन ने सिंहलद्वीप की ओर प्रस्थान किया क्षार समुद्र, क्षीर समुद्र, दधि समुद्र, उदधि समुद्र, सुरा समुद्र और किलकिला समुद्र को पार करके वे सातवें मानसरोवर समुद्र में पहुँचे जो सिंहलद्वीप के चारों ओर है !
सिंहलद्वीप में उतरकर जोगी रत्नसेन तो अपने सब जोगियों के साथ महादेव के मन्दिर में बैठकर तप और पद्मावती का ध्यासन करने लगा और हीरामन पद्मावती को मिलने के लिए बुलाने गया !
वसन्त पंचमी के दिन पद्मावती सखियों के सहित वहाँ पहुँची जिधर रत्नसेन थे ! पर ज्योंही रत्नसेन की ऑंखें उस पर पड़ीं, वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ! राजा को जब होश आया तब वह बहुत पछताने लगा और जल मरने को तैयार हुआ ! सब देवताओं को भय हुआ कि यदि कहीं यह जला तो इसकी घोर विरहाग्नि से सारे लोक भस्म हो जाएँगे ! उन्होंने जाकर महादेव पार्वती के यहाँ पुकार की !
महादेव कोढ़ी के वेश में बैल पर चढ़े राजा के पास आए और जलने का कारण पूछने लगे ! इधर पार्वती की, जो महादेव के साथ आईं थीं, यह इच्छा हुई कि राजा के प्रेम की परीक्षा लें ! ये अत्यन्त सुन्दरी अप्सरा का रूप धारकर आईं और बोली -'मुझे इन्द्र ने भेजा है ! पद्मावती को जाने दे, तुझे अप्सरा प्राप्त हुई ! रत्नसेन ने कहा-'मुझे पद्मावती को छोड़ और किसी से कुछ प्रयोजन नहीं !
पार्वती ने महादेव से कहा कि रत्नसेन का प्रेम सच्चा है। रत्नसेन ने देखा कि इस कोढ़ी की छाया नहीं पड़ती है, फिर महादेव को पहचानकर वह उनके पैरों पर गिर पड़ा ! महादेव ने उसे सिद्धि गुटिका दी और सिंहलगढ़ में घुसने का मार्ग बताया ! सिद्धि गुटिका पाकर रत्नसेन सब जोगियों को लिए सिंहलगढ़ पर चढ़ने लगा !
राजा गन्धर्वसेन के यहाँ जब यह खबर पहुँची तब उसने दूत भेजे ! दूतों से जोगी रत्नसेन ने पद्मिनी के पाने का अभिप्राय कहा ! दूत क्रुद्ध होकर लौट गए ! इस बीच हीरामन रत्नसेन का प्रेमसन्देश लेकर पद्मावती के पास गया और पद्मावती का प्रेमभरा सँदेसा आकर उसने रत्नसेन से कहा ! इस सन्देश से रत्नसेन के शरीर में और भी बल आ गया ! गढ़ के भीतर जो अगाध कुण्ड था वह रात को उसमें धँसा और भीतरी द्वार को, जिसमें वज्र के किवाड़ लगे थे, उसने जा खोला ! पर इस बीच सबेरा हो गया और वह अपने साथी जोगियों के सहित घेर लिया गया ! राजा गन्धर्वसेन के यहाँ विचार हुआ कि जोगियों को पकड़कर सूली दे दी जाय ! दल बल के सहित सब सरदारों ने जोगियों पर चढ़ाई की ! अन्त में सब जोगियों सहित रत्नसेन पकड़ा गया !
इधर यह सब समाचार सुन पद्मावती की बुरी दशा हो रही थी ! हीरामन तोते ने जाकर उसे धीरज बँधाया कि रत्नसेन पूर्ण सिद्ध हो गया है, वह मर नहीं सकता !
रत्नसेन को बाँधकर सूली देने के लिए लाए जब इधर सूली की तैयारी हो रहीथी, उधर रत्नसेन पद्मावती का नाम रट रहा था ! महादेव ने जब जोगी पर ऐसा संकट देखा तब वे और पार्वती भाँट भाँटिनी का रूप धरकर वहाँ पहुँचे। ! इस बीच हीरामन सूआ भी रत्नसेन के पास पद्मावती का यह संदेसा लेकर आया कि 'मैं भी हथेली पर प्राण लिए बैठी हूँ, मेरा जीना मरना तुम्हारे साथ है।' भाँट (जो वास्तव में महादेव थे) ने राजा गन्धर्वसेन को बहुत समझाया कि यह जोगी नहीं राजा और तुम्हारी कन्या के योग्य वर है, पर राजा इस पर और भी क्रुद्ध हुआ ! इस बीच जोगियों का दल चारों ओर से लड़ाई के लिए चढ़ा !
महादेव के साथ हनुमान आदि सब देवता जोगियों की सहायता के लिए आ खड़े हुए ! गन्धर्वसेन की सेना के हाथियों का समूह जब आगे बढ़ा तब हनुमानजी ने अपनी लम्बी पूँछ में सबको लपेटकर आकाश में फेंक दिया ! राजा गन्धर्वसेन को फिर महादेव का घण्टाऔर विष्णु का शंख जोगियों की ओर सुनाई पड़ा और साक्षात् शिव युद्धस्थल में दिखाई पड़े ! यह देखते हि गन्धर्वसेन महादेव के चरणों पर जा गिरा और बोला-'कन्या आपकी है, जिसे चाहिए उसे दीजिए' !
इसके उपरान्त हीरामन सूए ने आकर राजा रत्नसेन के चित्तौर से आने का सब वृत्तान्त कह सुनाया और गन्धर्वसेन ने बड़ी धूमधाम से रत्नसेन के साथ पद्मावती का विवाह कर दिया !
पद्मिनी को लेकर समुद्रतट पर जब रत्नसेन आया तब समुद्र याचक का रूप धरकर राजा से दान माँगने आया, पर राजा ने लोभवश उसका तिरस्कार कर दिया !
राजा आधे समुद्र में भी नहीं पहुँचा था कि बड़े जोर का तूफान आया जिससे जहाज दक्खिन लंका की ओर बह गए वहाँ विभीषण का एक राक्षस माँझी मछली मार रहा था ! वह अच्छा आहार देख राजासे आकर बोला कि चलो हम तुम्हें रास्ते पर लगा दें ! राजा उसकी बातों में आ गया ! वह राक्षस सब जहाजों को एक भयंकर समुद्र में ले गया जहाँ से निकलना कठिन था ! जहाज चक्कर खाने लगे और हाथी, घोड़े, मनुष्य आदि डूबने लगे ! इस बीच समुद्र का राजपक्षी वहाँ आ पहुँचा जिसके डैनों का ऐसा घोर शब्द हुआ मानो पहाड़ के शिखर टूट रहे हों ! वह पक्षी उस दुष्ट राक्षस को चंगुल में दबाकर उड़ गया ! जहाज के एक तख्ते पर एक ओर राजा बहा और दूसरे तख्ते पर दूसरी ओर रानी ! पद्मावती बहते बहते वहाँ जा लगी जहाँ समुद्र की कन्या लक्ष्मी अपनी सहेलियों के साथ खेल रही थी ! लक्ष्मी मूर्च्छित पद्मावती को अपने घर ले गयी ! इधर राजा बहते बहते एक ऐसे निर्जन स्थान में पहुँचा जहाँ मूँगों के टीलों के सिवा और कुछ न था !
राजा पद्मिनी के लिए बहुत विलाप करने लगा और कटार लेकर अपने गले में मारना ही चाहता था कि ब्राह्मण का रूप धरकर समुद्र उसके सामने आ खड़ा हुआ और उसे मरने से रोका ! अन्त में समुद्र ने राजा से कहा कि तुम मेरी लाठी पकड़कर ऑंख मूँद लो; मैं तुम्हें जहाँ पद्मावती है उसी तट पर पहुँचा दूँगा !
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खैर दोनों का मिलन हुआ ! बच्चे हुए !
लेकिन असल सवाल तो ये की -
ब्रम्हा, विष्णु, महेश और हनुमान से पर्सनल सेटिंग रखने वाला रत्नसेन, खिलजी से हार कैसे गया ?? इन सब भगवानो की शक्ति समाप्त हो गयी थी क्या ??
या ये सब कोरी गप्प है ?
अब या तो गप्प मानो या फिर ये मानो की सारे भगवान निठल्ले थे जो अपने दोस्त और दोस्त की बीबी यानी पदमिनी भाभी को बचाने भी नहीँ आये !

-गिरिराज वेद जी (अरविन्द राज स्वरूप की वाल से)

Thursday, November 9, 2017

धर्म निरपेक्षता दावं पर : लोकतांत्रिक मूल्य ताक पर

बात दो सहधर्मियों से ही शुरू करते हैं। राजस्थान में सर्वाधिक पाठकों वाले दो अखबार राजस्थान  पत्रिका और दैनिक भास्कर को तटस्थता से लगातार देखने वाले समझते होंगे कि जहां पत्रिका लगातार इस ओर प्रयत्नरत है कि लोकतांत्रिक मूल्य और धर्म निरपेक्षता जैसे संवैधानिक प्रावधानों को प्रतिष्ठ किया जाए- पीछे का मकसद कुछ भी हो, पत्रिका के तेवर आभास यही दे रहे हैं। वहीं दैनिक भास्कर विभिन्न अन्तर्वस्तुओं में पत्रिका से पिछड़ता लग रहा है।
विषयान्तर के साथ एक ताजे उदाहरण में हिन्दी साहित्य की लेखिका कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ सम्मान देने की घोषणा की खबर से दोनों अखबारों के अन्तर को समझ सकते हैं। क्योंकि साहित्य और संस्कृति को प्रतिष्ठा देने-दिलाने का काम मीडिया का भी है, दैनिक भास्कर ने साहित्य की इस खबर को ठोक-पीट छोटी कर हाशिये पर लगा दिया। पत्रिका ने ना केवल खबर को ढंग से लगाया बल्कि भीतरी पृष्ठों पर कृष्णा सोबती पर एक फीचर भी लगाया।
लौट आते हैं मुद्दे पर, आज इस पर चर्चा करने की जरूरत इसलिए समझी गई कि राजस्थान पत्रिका के 6 नवम्बर 2017 अंक के दखल कॉलम में गोविन्द चतुर्वेदी का एक अग्रलेख 'विधायक कोष : धर्म नहीं विकास पर खर्च होप्रकाशित हुआ है। देश में धर्म निरपेक्ष मूल्यों के प्रतिकूल साबित होते इस मामले में राजस्थान के सर्वाधिक पाठकों वाले इस अखबार ने सरकार की संविधान के प्रतिकूल उन नीतियों पर अंगुली उठाने का साहस दिखाया जिससे बहुसंख्यक वर्ग का उग्र पाठक असहज हो सकता है। चतुर्वेदी ने राजस्थान सरकार की उस छूट को गलत बताया जिसमें विधायक कोटे से धार्मिक स्थलों पर खर्च करने की छूट दी गई है। जब से सांसद व विधायक विवेक-कोष का प्रावधान किया गया, तब से धार्मिक और निजी काम इस कोष से करवाने की छूट नहीं थी, केवल विकास के काम ही करवाए जा सकते थे।
इस तरह के तुष्टीकरण पर आजादी बाद से ही मीडिया प्रभावी तौर पर आवाज उठाता तो आज बहुसंख्यकों के इस तरह तुष्टीकरण का शासन साहस नहीं कर पाता। यहां एक अन्तर समझना जरूरी है: दलितों और पिछड़ों को आरक्षण देने और अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए चलाई जा रही योजनाओं को तुष्टीकरण नहीं कहा जा सकता, इसे सामाजिक समरसता और आर्थिक समानता लाने के उद्देश्य से धर्म निरपेक्ष लोककल्याणकारी शासन के कर्तव्यों में माना जायेगा।
धार्मिक यात्राओं यथा हज यात्रा-तीर्थयात्रा के लिए आर्थिक सहयोग तुष्टीकरण श्रेणी में आयेगा। इसी तरह सरकारी और सार्वजनिक आयोजनों में धार्मिक प्रतीकों की पूजा-प्रतिष्ठा धर्म निरपेक्ष राज्य की अवधारणा के खिलाफ है। आजादी बाद से ना शासन ने और ना ही मीडिया ने कभी इस पर अंगुली उठाई। इस तरह के क्रियाकलापों को नजरअन्दाज करना भी बढ़ावा देने में ही गिना जाएगा। बहुसंख्यकों को दी जाने वाली इस तरह की छूटें प्रकारान्तर से अल्पसंख्यकों और दलितों के मन पर बहुत सूक्ष्म तौर पर असुरक्षा और भय पैदा करती हैं। आजादी बाद देश में और प्रदेशों में अधिकांशत: कांग्रेस का शासन रहा है, इसलिए इस तरह के क्रिया-कलापों के लिए उसे ही ज्यादा जिम्मेदार मानना चाहिए। चूंकि इस पर मीडिया ने कभी प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया अत: मीडिया को भी बरती इस गैर जिम्मेदाराना उपेक्षा से मुक्त नहीं किया जा सकता।
सांसदों और विधायकों के विवेकाधीन कोष को खर्च ना करने पर यदा-कदा खबर छपती रही हैं। लेकिन वे उसे खर्च कहां और किस मकसद से कर रहे हैं इस पर नैतिक-वैधानिक आकलन मीडिया में बहुत कम आता है। देखा गया है कि रस्ते-गलियां निकालकर जाति-समुदायविशेष के श्मशानों-कब्रिस्तानों और भवनों के निर्माण में विधायक-सांसद कोटे का दुरुपयोग होता रहा है। यह शोध का विषय हो सकता है कि समाज या समुदायविशेष के लिए इस तरह लगाए जाने वाले धन का लाभ क्या चुनावों में संबंधित सांसद-विधायक को होता है? क्योंकि इस तरह के कार्य इसी मकसद से करवाए जाते हैं। पड़ताल की जाए तो इस तरह के प्रलोभनों से वोटों पर कोई खास असर नहीं होता पाया जायेगा।
असल में विधायक और सांसद कोटे का उपयोग वहां होना चाहिए जहां आमजन को विशेष जरूरत हो और जो जरूरतें सरकारी-योजनाओं और बजट के अभाव में कई बार पूरी नहीं हो पाती या उनके पूरा होने में देर लगने की आशंका हो। होना यह चाहिए कि सार्वजनिक सुविधाओं यथा शौचालय, मूत्रालय, कई हिस्सों में जरूरी नालियां, डिस्पेंसरी-स्कूलों की छोटी-मोटी जरूरतें, कमजोर वर्ग के अविकसित मोहल्लों में न्यूनतम सुविधाएं विकसित करने, गांव है तो गांव के दूर से निकलने वाली सड़कों के किनारे विश्रामालय आदि-आदि की सुविधाओं को विकसित करने में इस धन का सदुपयोग हो।
नये प्रावधानों में सरकार ने उन धार्मिक स्थलों को विकसित करने की छूट दे दी जिनके पास वैसे ही वैध-अवैध धन प्रचुर मात्रा में आता है। अनुमान है कि देश के धार्मिक स्थलों में पहले से इतनी धन-सपत्ति निष्क्रिय तौर पर संचित है जिससे देश की अर्थव्यवस्था में भारी सुधार हो सकता है। इन्हीं सब के मद्देनजर गोविन्द चतुर्वेदी का उक्त उल्लेखित अग्रलेख विशेष है।
दीपचन्द सांखला

8 नवम्बर, 2017

Thursday, November 2, 2017

पत्रकारीय पेशे पर संकट

पत्रकारिता के बेहतरीन दिनों का भी मैं साक्षी रहा हूं। अधिकतर लोग पत्रकारिता के पेशे में इसलिए आते थे कि वे अपनी कलम के माध्यम से एक बेहतर समाज की रचना में भागीदार बनना चाहते थे। सत्यनिष्ठा और संघर्षशीलता पत्रकारिता के अनिवार्य गुण होते थे। इस अंग में समय के साथ जो गिरावट आई उसे भी लगातार देख रहा हूं, लेकिन फिर यह भी कल्पना से परे था कि पत्रकारिता कहां से कहां पहुंच जाएगी।
उक्त कथन छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन के उस सम्पादकीय का हिस्सा है, जो उन्होंने 31 अक्टूबर, 2017 के अपने अखबार 'देशबन्धु' के लिए लिखा। सन्दर्भ छत्तीसगढ़ के ही पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ्तारी का है। छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री राजेश मूणत से संबंधित बताई जा रही सीडी के आधार पर वर्मा को भयादोहन का आरोपी बनाया गया है। किसी महिला के साथ अंतरंग क्षणों की इस वीडियो क्लीपिंग के सही-गलत की जांच अभी होनी है। ठीक इसी तरह सीडी के माध्यम से विनोद वर्मा पर भयादोहन का आरोप भी अभी साबित होना है। लेकिन पूरे घटनाक्रम को देखा-समझा जाए तो छत्तीसगढ़ शासन की मंशा और नीयत संदेह के घेरे में है। विनोद वर्मा को जिन धाराओं में हिरासत में लिया गया और फिर अस्वस्थता के बावजूद जिस तरह गाजियाबाद से उन्हें रायपुर ले जाया गया, उसका मकसद उन पत्रकारीय पेशेवरों को सबक देना भी है, जो हाल तक रीढ़ सीधी रखे हुए हैं, अन्यथा आज के अधिकांश मीडिया और पत्रकार अपने मालिकों के और अपने हितसाधक हो चुके हैं, ऐसों के लिए सूचना प्रसारण मंत्री की हैसियत से 1977 में दिया लालकृष्ण आडवाणी का वह कथन याद आता है जिसमें आपातकाल का जिक्र करते हुए उन्होंने पत्रकारों को उलाहना दिया कि 'आपको झुकने के लिए कहा गया, लेकिन आप तो रेंगने ही लग गये।'
छत्तीसगढ़ की उक्त घटना और हाल ही में राजस्थान विधानसभा में रखा गया दण्ड विधियां (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2017, जिसमें मीडिया को भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों से संबंधित खबर प्रसारित करने पर सजा का प्रावधान किया गया है। राजस्थान के लुंज-पुंज विपक्ष, मानिकचंद सुराना और घनश्याम तिवाड़ी द्वारा विधानसभा में इस विधेयक के प्रति प्रभावी असहमति और कुछ मीडिया घरानों के भारी विरोध (जिसमें राजस्थान पत्रिका का विरोध विशेष उल्लेख्य है) के बाद सरकार सहम गई और विधेयक को प्रवर समिति को सौंप दिया, इसे दूसरे तरह से ठण्डे बस्ते में डाला जाना ही कहा जा सकता है। लेकिन आश्चर्य यह भी है कि इस विधेयक का मुखर विरोध तब क्यों नहीं हुआ जब कुछ माह पूर्व अध्यादेश के माध्यम से इसे सूबे पर थोप दिया गया था। खैर, देर आयद-दुरस्त आयद, कि गलत का विरोध जब भी हुआ तभी ठीक है। हो सकता है सरकार ने सबक लेकर इस अध्यादेश को उसके नियत समय पर अपनी मौत मरने को छोड़ दिया हो।
राजस्थान पत्रिका में गुलाब कोठारी के नाम से एक नवम्बर, 2017 को प्रकाशित अग्रलेख में यह घोषणा जिसमें कहा गया है कि जब तक सरकार उस काले कानून को वापस नहीं लेगी तब तक उनका अखबार मुख्यमंत्री वसुंधरा और उनसे संबंधित समाचारों को प्रकाशित नहीं करेगा, यह निर्णय भी एक दूसरी तरह की अति को ही जाहिर कर रहा है। पत्रिका का एक पाठक वर्ग है और जो अखबार वह खरीद रहा है उससे सूबे से संबंधित सभी तरह के समाचारों से रू-बरू होने का उसका हक भी है। दरअसल जो हमेशा तटस्थ नहीं रह पाते, वही इस तरह के अतिश्योक्तिपूर्ण निर्णय करते हैं। अशोक गहलोत के प्रथम मुख्यमंत्री काल में निहायत व्यक्तिगत कारणों से ऐसा ही अघोषित-सा निर्णय सूबे के दूसरे बड़े अखबार ने गहलोत के लिए किया था, जो थोड़े दिनों बाद स्वत: हांफने लगा था।
पूर्व में पत्रकारीय पेशे के जिस संकट से बात शुरू की वह इन तात्कालिक दोनों बड़े संकटों से बड़ा संकट है। अधिकांश मीडिया हाउसेज कोरे धंधेबाज हो गये हैं। उन्हें पत्रकार, सम्पादक के रूप में अपना हित साधक चाहिए, इसकी एवज में पत्रकार संपादक चाहें तो अपने सीमित हित भी साध सकते हैं। इस पेशे में यह जो गैर-पेशेवरा मूल्यहीनता का खेल शुरू हुआ, वह ज्यादा गंभीर बात है। पत्रकारों में आत्मसम्मान का बोध सिरे से गायब हो रहा है और हर जगह हेकड़ी अपना स्थान लगातार बनाती जा रही है। शासक, राजनेता और कॉरपोरेट घरानों को किसी पत्रकार का आत्मसम्मान जहां असहज कर देता है वहीं कोरे हेकड़ीबाज पत्रकार को सहलाना उनके लिए ज्यादा आसान होता है। आत्मसम्मान और हेकड़ी में अन्तर की समझ बिना विवेक के संभव नहीं, यह सब पेशेवर मूल्यों की गहरी समझ की मांग करता है जो पत्रकारों-सम्पादकों में लगभग नदारद होती जा रही है।
राजस्थान सरकार का मीडिया पर अंकुश लगाने के मकसद से लाया गया अध्यादेश हो या छत्तीसगढ़ सरकार की पत्रकार विनोद वर्मा पर कार्यवाही-दोनों ही प्रकरण इस पेशे में बढ़ती रेंगने की प्रवृत्ति से प्रेरित हैं। पत्रकार बजाय हेकड़ी के अपना आत्मसम्मान सहेजे रखें तो धनबल और सत्ताबल कभी ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकेंगे।
दीपचन्द सांखला

2 नवम्बर, 2017

Friday, October 13, 2017

हिन्दू राष्ट्रवादी पत्रकार और 'नया इंडिया' के संपादक हरिशंकर व्यास का यह आलेख पढ़ा जाना चाहिए।

“ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।

“आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है - वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!

“अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!

“आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।

“सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।

“यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।

“आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।

“जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।

“इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!

“और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। ...”
13 अक्टूबर, 2017

Thursday, October 12, 2017

सूबे की सरकार और उपचुनावों के बहाने प्रदेश कांग्रेस की पड़ताल

देश की वर्तमान राजनीति को सरसरी तौर पर देखें तो राजस्थान उन प्रदेशों में से है, जहां आज भी कांग्रेस की ठीक-ठाक जड़ें कायम हैं। भले ही पिछले चुनाव में इस पार्टी की विधानसभा में सीटें लगभग अप्रभावी रह गईं थी। लहर और आंधी में आए चुनाव परिणाम स्थाई नहीं होते, इसकी पुष्टि पिछले लोकसभा चुनावों के तत्काल बाद के दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणामों में और फिर उसके बाद हुए वहां के स्थानीय निकायों के चुनाव परिणामों से भलीभांति हो जाती है।
राजस्थान के पिछले विधानसभा चुनावों में 'ना भूतो' बहुमत के साथ वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। जीत की उस खुमारी में राजे प्रदेश के लिए कुछ करने का मन बनाती, तब तक भाजपा के अच्छे-खासे बहुमत के साथ केन्द्र में नरेन्द्र मोदी काबिज हो लिए। बाद इसके, जैसी कि मोदी की अधिनायकवादी फितरत है, मोदी के 'सरकिट' माने जाने वाले अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनाकर, पार्टी पर भी वे पूरी तरह काबिज हो गए। यह बात अलग है कि यह सरकिट फिल्मी नहीं है, खुद मुन्नाभाई होने की हसरत इनकी कभी भी जाग सकती है। अमित शाह ने तौर-तरीके एकदम बदल दिए। जो भाजपा अब तक क्षत्रपों से पोषित-प्रभावित होती आई है, ये नयी स्थितियां कई दिग्गजों के साथ क्षत्रपों को भी असहज करने वाली थी। भैरोसिंह शेखावत के बाद से राजस्थान की भाजपाई क्षत्रप वसुंधरा राजे रही हैं। जिस मिजाज की वसुंधरा हैं, उनके लिए इन नये तौर-तरीकों में अपने को अनुकूलित कर पाना असंभव-सा था। इन्हीं स्थितियों का खमियाजा ये प्रदेश भुगत रहा है। अपने पिछले कार्यकाल में दीखती सक्रियताओं में रही वसुंधरा राजे इस बार अनमनी ही नजर आती हैं।
सूबे की ऐसी अकर्मण्य परिस्थितियों ने जहां विपक्ष को कई गुंजाइशें दीं तो हैं, लेकिन 2013-14 के चुनावों में घायल हुआ विपक्ष आज तक अपने को संभाल नहीं पाया। जिस तरह की लोकतांत्रिक प्रणाली को हमने स्वीकार किया है उसमें एक सशक्त विपक्ष का होना लाजमी है। प्रदेश में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ही है, इसलिए विपक्ष की भूमिका में प्रदेश में और देश में भी लोकतांत्रिक मूल्यों को सहेजे रखने की उम्मीदें फिलहाल कांग्रेस से ही की जा सकती हैं।
पिछले चुनावों में लुंज-पुंज हुई कांग्रेस में ऊर्जा के संचार के लिए कहने को कमान युवा सचिन पायलट को सौंपी गई। इस 'कहने को' कहने का वाजिब कारण भी है। जब से सचिन को कमान मिली, तब से ही प्रदेशव्यापी सक्रियता उनकी वैसी देखी नहीं गई, जैसी बदतर गति को प्राप्त पार्टी में जोश पैदा करने के लिए जरूरी थी। हो सकता है उन्हें जिम्मेदारी देते वक्त यह अहसास करा दिया गया हो या हो सकता है अपनी अक्षमताओं के चलते यह भान हो गया है कि उनकी यह नियुक्ति अस्थाई है। यदि ऐसा है भी तो एक पूर्णकालिक राजनेता से उम्मीद की जाती है कि वह दी गई किसी भी जिम्मेदारी को नैष्ठिक जोश-खरोश अंजाम तक पहुंचाए। अपनी नियुक्ति के बाद से सचिन पायलट ने ऐसी सक्रियता आज तक नहीं दिखाई। सचिन चाहते तो अब तक वे राजस्थान के सभी कस्बों और छोटे-बड़े शहरों की एकाधिक यात्राएं करके पार्टी में जान फूंकने का काम कर सकते थे। जिसका लाभ केवल पार्टी को ही नहीं, खुद उन्हें भी मिलता। वे एक सर्वमान्य नेता के तौर पर प्रदेश में स्थापित होते। युवा और सौम्य कदकाठी के साथ-साथ वैचारिक तौर पर भी तार्किक सचिन काफी सुलझे हुए हैं, ऐसी छाप उन्होंने टीवी-डिबेटों में कई बार छोड़ी है। प्रदेश के सभी हिस्सों में जनता और कार्यकर्ताओं तक पहुंच कर व्यक्तिगत वाकफियत बढ़ाने का अवसर सचिन पायलट ने लगभग हाथ से निकल जाने दिया है। इतना ही नहीं, भीड़ में वे अपने को असहज पाते हैं और दूर-दराज से आए पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों मिलने से बचते रहते हैं, कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की यह आम शिकायत है कि पीसीसी अध्यक्ष उसी दिन कम ही मिलते हैं जिस दिन कार्यकर्ता जयपुर पहुंचते हैं, उन्हें मिलने के लिए दूसरे-तीसरे दिन तक वहां रुकना पड़ता है। सचिन पायलट के ऐसे व्यवहार से लगता है कि उनकी राजनीतिक आकांक्षा सूबे में क्षत्रप होना ना हो।
यह भी सुनने में आता है कि राजस्थान की राजनीति बाहरी लोगों को स्थापित करने का जरीया है, इसके लिए वे भाजपा और कांग्रेस दोनों को भुंडाते हैं। उदाहरण के तौर पर वसुंधरा राजे और सचिन पायलट का नाम लिया जाता है, ये दोनों ही इस आरोप में सटीक इसलिए नहीं बैठते कि मराठी मूल की वसुंधरा चाहे मध्यप्रदेश की हों, वह शादी करके राजस्थान आयीं हैं। शादी के बाद स्त्री का घर ससुराल को मानने वाली संस्कृति में ऐसी बातें परम्परागत समाज व्यवस्था को चुनौती है। ऐसे ही यूपियन मूल के पिता राजेश पायलट का और अब खुद सचिन का घर बार चाहे दिल्ली में ही हो लेकिन पिता-फिर मां और अब खुद की राजनीतिक स्थली राजस्थान ही रही है। इस तरह सचिन को भी साफ-साफ बाहरी नहीं कह सकते। यह भी कि सचिन का मन यदि सूबे की राजनीति में रमता तो प्रदेश कांग्रेस की कमान मिलने के बाद वे अपने घर-परिवार को राजस्थान ले आते।
उक्त सब बातों को छोड़ भी दें तो अपने लिए तय जिम्मेदारी पर खरा जताने को सचिन के लिए लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव माकूल अवसर हैं। खुद उन्हें आगे आकर अपनी हारी अजमेर लोकसभा सीट पर उम्मीदवारी जतानी चाहिए।
नोटबंदी की मूर्खता व जीएसटी लागू करने में जो अनाड़ीपना मोदी सरकार ने दिखाया है, उसके चलते पिछले डेढ़-दो माह में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आया है वहीं सूबे में वसुंधरा के कामचलाऊ राज से जनता को जैसी निराशा मिली, उसमें सचिन का अजमेर सीट से जीतना मुश्किल नहीं है। होना तो यह चाहिए कि अजमेर के साथ ही अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा के उपचुनावों में कांग्रेस को जिताने की चुनौती सचिन को पूरे आत्मविश्वास से लेनी चाहिए। अशोक गहलोत गुजरात चुनावों की जिम्मेदारी के चलते व्यस्त भले ही हों, इन उपचुनावों में उनकी काबिलियत और समझ का सहयोग ले कर तीनों 'उपचुनावों' में जीतने का संकल्प उन्हें बना लेना चाहिए। इससे जहां राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को बल मिलेगा वहीं इस हार से प्रदेश भाजपा भी वर्ष भर बाद प्रदेश विधानसभा के चुनावों के मद्देनजर दबाव महसूस करेगी। अलवर लोकसभा उपचुनाव को सीट को जहां राहुल-सखा जितेन्द्रसिंह की प्रतिष्ठा का हेतु बनाया जा सकता है तो फिर माण्डलगढ़ विधानसभा उपचुनाव सीपी जोशी की नाक का सवाल क्यों नहीं हो सकता। सचिन पायलट को केन्द्र की राजनीति में यदि लौटना ही है तो प्रदेश की ये तीनों जीतें उन्हें बढ़े कद के साथ वहां प्रतिष्ठ करेगी।
दीपचन्द सांखला

12 अक्टूबर, 2017

Thursday, October 5, 2017

पड़ताल मोदी-शाह की साझेदारी फर्म हो चुकी भाजपा की

पिछले डेढ़-दो माह से देश में राज के खिलाफ बेचैनी वैसी सी कसकने लगी जैसी 2011-12 में तत्कालीन कांग्रेस नीत संप्रग-दो के राज में दिखने लगी थी। वाजिब वजह भी है, राहत तो दूर सभी तरह की परिस्थितियां पिछले राज से भी लगातार बदतर होती जा रही हैं। ऊपर से सरकार के नोटबन्दी जैसे मूर्खतापूर्ण निर्णय और बाद फिर हाल में अनाड़ीपने से लागू की गई जीएसटी कर-प्रणाली ने अवाम का धैर्य चुका दिया है। संघनिष्ठ घुन्नों और उन मोदीनिष्ठों को छोड़ दें जो अब भी खुद के गलत साबित होने का हौसला नहीं जुटा पा रहे हैं, तो शेष मोदी समर्थक असफल-पुराण बंचने पर या तो चुप हो लेते हैं या इतना भर कह पाते है कि मोदी ने तो मरवा दिया। कुछेक पुराने मोदीनिष्ठ ऐसे भी हैं जो मोदीजी को मजा चखाने को अगले चुनाव का इन्तजार करने का भी खुलकर कहने लगे हैं।
मोदी को नसीबवाला तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि 2011-12-13 में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के लिए अनुकूलताएं लगातार बनती गईअन्ना हजारे का सक्रिय होना, योगधंधी रामदेव की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का जागना और उस सब के बीच निर्भया काण्ड का घटित होना, ऐसी सभी घटनाएं और प्रतिक्रियाएं तत्कालीन शासन को उघाड़ कर रखने को पर्याप्त सिद्ध हुईं। लेकिन इस सब के बावजूद अवाम को हासिल क्या हुआ, इस बदले राज को भी साढ़े तीन वर्ष हो लिए, अन्ना द्वारा उठाये किसी भी मुद्दे पर अमल करना तो दूर, यह सरकार उन मुद्दों पर मसक ही नहीं रही। बावजूद इसके अन्ना का चुप्पी साधे रखना लोगों को अब सालने लगा है। सोशल साइट्स पर अन्ना से पूछा जाने लगा है कि पिछली सरकार को भुंडाने की कितनी सुपारी मिली थी। वहीं रामदेव इस राज में मिली पोल से अपने धंधे को अच्छे से चमकाने में लग गये हैं। खुद द्वारा उठाए गए मुद्दों को रामदेव अब याद भी नहीं करना चाहते।
लोकतांत्रित विडंबना यह है कि पूरे विपक्ष को सांप सूंघ गया है। वह शायद वैसी अनुकूलता के इंतजार में है, जैसी भाजपा और मोदी को 2012-13 में मिल गई थी। गुजरात में वैसी अनुकूलता कांग्रेस को मिलती दिखने भी लगी है।
भारतीय जनता पार्टी संगठन नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की साझेदारी फर्म में लगभग तबदील हो चुका है। कुछ वरिष्ठों को मार्गदर्शक बना कर थरप दिया है तो शेष वरिष्ठ सहम कर साझेदारी फर्म भाजपा के कारिंदें होने में ही अपनी भलाई मान जैसी-तैसी हैसियत में चुप हैं।
रही बात लोकतंत्र का चौथा पाया माने जाने वाले अखबारों की, टीवी आने के बाद ये पेशा थोड़ा व्यापक सम्बोधन के साथ मीडिया बनकर लगभग धर्मच्युत हो लिया है। पिछली सदी के आठवें दशक में इन्दिरा गांधी की बड़ी भूल आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल के दौरान धर्मच्युत हुए मीडिया को फटकारते हुए कहा था कि शासन ने आपातकाल में झुकने के लिए कहा और आप तो दंडवत हो लिए। वे ही आडवाणी आज अपने पार्टी संगठन के साझेदारी फर्म में तबदील होने और मीडिया के टुकड़ैल हो जाने पर मूर्तिवत हैं। परिस्थितियां आपातकाल में मीडिया के दंडवत हो जाने से बदतर हैं। नहीं कह सकते कि मीडिया की नियति क्या बनेगी लेकिन फिलहाल यही लग रहा है कि अधिकांश की नीयत ठीक नहीं है। अब तो किसी को पत्रकार कहते भी संकोच होने लगा है।
प्रधानमंत्री मोदी को अभी भी लग रहा है कि उनके असत्यमेध के रथ को कोई रोकने वाला नहीं है। हाल ही में उन्होंने अपने भाषणों से गुजरात-हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं का चुनाव अभियान शुरू किया है, वहां की जनसभाओं में वे भ्रमित करने वाले अपने उसी अंदाज में नजर आए। उन्हें लगता है कि देश की अधिकांश जनता भोली और मासूम है-जो है भीफिर उनके बहकावे में आ लेगी। उन्हें यह भी भरोसा है कि भाजपा कंपनी में उनके घाघ साझीदार अमित शाह कम्पनी के फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों से पूर्व ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार हुए साम्प्रदायिक दंगों के बाद के साम्प्रदायिक धु्रवीकरण का अप्रत्याशित लाभ उनकी कंपनी उठा चुकी है। हिमाचल प्रदेश में भले ही ऐसे दंगों की गुंजाइश कम हो लेकिन वहां शासन कर रही कांग्रेस की सरकार ने इस कम्पनी हेतु काफी अनुकूलताएं बना दी हैं। गुजरात में भाजपा कम्पनी का विपक्ष ना केवल चौकन्ना है बल्कि वहां के अल्पसंख्यक भी पूरे सावचेत हैं। साम्प्रदायिक धु्रवीकरण की अनुकूलता मोदी एण्ड शाह एसोसिएट को वे इस बार शायद ही दें। रही सही कसर भाजपा के परम्परागत वोट रहे पटेलों की नाराजगी से पूरी हो सकती है तो गोरक्षा के नाम पर नरभक्षकों के शिकार हुए गुजरात के दलितों में भी चेतना का संचार हुआ है। लेकिन अमित शाह को हलके में लेना गुजरात में कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है वहीं राज के विरोधी हुए पटेलों और दलितों में फांट डालकर बदलाव के उनके सामूहिक मंसूबों पर भी पानी फेर सकता है।
दीपचन्द सांखला

5 अक्टूबर, 2017